upboardsyllabusclass12

UP board Syllabus रस

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
काव्य-सौन्दर्य के तत्त्वUP Board — रस
Chapter 11
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

स्थायी भाव तथा संचारी भावों में पारस्परिक सम्बन्ध

रस, स्थायी भाव तथा संचारी भावों के परस्पर सम्बन्ध को इस प्रकार प्रदर्शित किया जा सकता है

रसस्थायी भावसंचारी भाव
श्रृंगाररतिस्मृति, चिन्ता, हर्ष, मोह इत्यादि।
हास्यहासहर्ष, निद्रा, आलस्य, चपलता इत्यादि।
करुणशोकग्लानि, शंका, चिन्ता, दीनता इत्यादि।
रौद्रक्रोधउग्रता, शंका, स्मृति इत्यादि।
वीरउत्साहआवेग, हर्ष, गर्व इत्यादि।
भयानकभयत्रास, ग्लानि, शंका, चिन्ता इत्यादि।
वीभत्सजुगुप्सादीनता, निर्वेद, ग्लानि इत्यादि।
अद्भुतविस्मयहर्ष, स्मृति, आवेग, शंका इत्यादि।
शान्तनिर्वेद (वैराग्य)हर्ष, स्मृति, धृति इत्यादि।
वात्सल्यवत्सलताचिन्ता, शंका, हर्ष, स्मृति इत्यादि।
भक्तिभगवद् विषयक रतिनिर्वेद, हर्ष, वितर्क, मति इत्यादि।

रस

• प्रश्न-पत्र में काव्य-सौन्दर्य के तत्वों (रस, छन्द तथा अलंकार) से 2-2 अंकों के तीन प्रश्न (लघु उत्तरीय या बहुविकल्पीय) पूछ
जाते हैं।

रस का अर्थ

रस का शाब्दिक अर्थ आनन्द है। संस्कृत में वर्णन आया है-‘रस्यते आस्वादयते इति रसः’ अर्थात जिसका आस्वादन किया जाए, वह
रस है, किन्तु साहित्यशास्त्र में काव्यानन्द अथवा काव्यास्वाद के लिए रस शब्द प्रयुक्त होता है।।

परिभाषा

काव्य को पढ़ने, सुनने अथवा नाटक देखने से सहृदय पाठक, श्रोता अथवा दर्शक को प्राप्त होने वाला विशेष आनन्द रस कहलाता है।
कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, फिल्म आदि को पढ़ने, सुनने अथवा देखने के क्रम में उसके पात्रों के साथ स्थापित होने वाली आत्मीयता के कारण काव्यानुभूति एवं काव्यानन्द व्यक्तिगत संकीर्णता से मुक्त होता है। काव्य का रस सामान्य जीवन में प्राप्त होने वाले आनन्द से। इसी अर्थ में भिन्न भी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने व्यक्तिगत संकीर्णता से मुक्त अनुभव को ‘हृदय की मुक्तावस्था’ कहा हैं।

रस के अवयव

भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में लिखा है-‘विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद्रस निष्पत्ति:’ अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इनमें स्थायी भाव स्वत: ही अन्तर्निहित है, क्योंकि स्थायी भाव ही विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग से रस दशा को प्राप्त होता है। इस प्रकार रस के चार अवयव अथवा अंग है।

  1. स्थायी भाव
  2. विभाव
  3. अनुभाव
  4. संचारी अथवा व्यभिचारी भाव

स्थायी भाव

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे परिभाषित करते हुए लिखा है-‘प्रधान (स्थायी) भाव वही कहा जा सकता है, जो रस की अवस्था तक
पहुँचे।’ स्थायी भाव ग्यारह माने गए हैं-रति (स्त्री-पुरुष का प्रेम), हास (हँसी),शोक (दु:ख), क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा (घृणा),
विस्मय (आश्चर्य), निर्वेद (वैराग्य या शान्ति) तथा वत्सलता (छोटों के प्रति प्रेम), भगवद् विषयक रति (अनुराग)।

विभाव

विभाव से अभिप्राय उन वस्तुओं एवं विषयों के वर्णन से है, जिनके प्रति सहृदय के मन में किसी प्रकार का भाव या संवेदना होती है
अर्थात् भाव के जो कारण होते हैं, उन्हें विभाव कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि विभाव स्थायी भाव के उद्बोधक (जन्म देने
वाले) कारण होते हैं। विभाव दो प्रकार के होते हैं-आलम्बन एवं उद्दीपन।।

आलम्बन विभाव जिन व्यक्तियों या पात्रों के आलम्बन (सहारे) से स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं, वे आलम्बन विभाव कहलाते हैं। जैसे-नायक-नायिका। आलम्बन के भी दो प्रकार हैं

(i) आश्रय जिस व्यक्ति के मन में रति आदि विभिन्न भाव उत्पन्न होते हैं. उन्हें आश्रय कहते हैं।
(ii) विषय जिस वस्तु या व्यक्ति के लिए आश्रय के मन में भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें विषय कहते हैं। उदाहरण के लिए: यदि राम के मन में सीता के प्रति रति का भाव जाग्रत होता है, तो राम आश्रय होंगे और सीता विषय।। उद्दीपन विभाव आश्रय के मन में भाव को उद्दीप्त करने वाले विषय की बाहरी चेष्टाओं और बाह्य वातावरण को उद्दीपन विभाव कहते हैं; जैसे-दुष्यन्त
शिकार खेलते हुए कण्व के आश्रम में पहुँच जाते हैं। वहाँ वे शकुन्तला को देखते हैं।
शकुन्तला को देखकर दुष्यन्त के मन में आकर्षण या रति भाव उत्पन्न होता है। उस समय शकुन्तला की शारीरिक चेष्टाएँ दुष्यन्त के मन में रति भाव को और अधिक तीव्र करती हैं। इस प्रकार, विषय (नायिका शकुन्तला) की शारीरिक चेष्टाएँ तथा अनुकूल वातावरण को उद्दीपन विभाव कहा जाएगा।

अनुभाव

आन्तरिक मनोभावों को बाहर प्रकट करने वाली शारीरिक चेष्टा अनुभाव कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अनुभाव आश्रय के शारीरिक विकार हैं। अनुभाव चार प्रकार के होते हैं-सात्विक, कायिक, वाचिक एवं आहार्य।

(i) सात्विक जो अनुभाव मन में आए भाव के कारण स्वतः प्रकट हो जाते हैं, वे सात्विक हैं; जैसे-पसीना आना, रोएँ खड़े होना, कँपकँपी लगना, मुंह फीका पड़ना आदि। सामान्यत: आठ प्रकार के सात्विक अनुभाव माने जाते हैं–स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, विवर्णता, स्तम्भ, अश्रु और प्रलाप।

(ii) कायिक शरीर में होने वाले अनुभाव कायिक हैं; जैसे—किसी को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाना, चितवन से अपने प्रेमी को झाँकना आदि।
(iii) वाचिक किसी प्रसंग विशेष के वशीभूत होकर नायक अथवा नायिका (प्रेम-पात्र) द्वारा वाणी के माध्यम से अभिव्यक्ति, वाचिक अनुभाव है। जैसे-क्रोध में कठोर शब्द कहना।
(iv) आहार्य नायक-नायिका या अन्य पात्रों के द्वारा वेश-भूषा के माध्यम से भाव-प्रदर्शित करना आहार्य कहलाता है।

संचारी या व्यभिचारी भाव

स्थायी भाव के साथ आते-जाते रहने वाले अन्य भावों को अर्थात् मन के चंचल विकारों को संचारी भाव कहते हैं। संचारी भावों को व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। यह भी आश्रय के मन में उत्पन्न होता है। एक ही संचारी भाव कई रसों के साथ हो सकता है। वह पानी के बुलबुले की तरह उठता और शान्त होता रहता है।
उदाहरण के लिए; शकुन्तला के प्रति रति भाव के कारण उसे देखकर दुष्यन्त के मन में मोह, हर्ष, आवेग आदि जो भाव उत्पन्न होंगे, उन्हें संचारी भाव कहेंगे।

संचारी भावों की संख्या तैंतीस बताई गई है। इनमें से मुख्य संचारी भाव हैं-शंका, निद्रा, मद, आलस्य, दीनता, चिन्ता, मोह, स्मृति, धैर्य, लज्जा, चपलता, आवेग, हर्ष, गर्व, विषाद, उत्सुकता, उग्रता, त्रास निर्वेद, स्वप्न, मरण, श्रम, उन्माद, मीत, ग्लानि, अपस्मार, भावगोपन, व्याधि, जड़ता, अनुभूति, अमर्ष, असूया, वितर्क।

रस के भेद

रस के मुख्यत: दस (10) भेद होते हैं। हम रस के सभी भेदों को इस प्रकार स्मरण रख सकते हैं-
श्रृंगार-हास्य-करुण-वीर-रौद्र-भयानक:
‘वीभत्साद्भुत शान्ताश्च वात्सल्यश्च रसा दश।’

1 शृंगार रस

शृंगार रस का स्थायी भाव रति (प्रेम) है। रति का सामान्य अर्थ है-प्रीति, किसी मनोनुकूल प्रिय व्यक्ति की ओर मन का झुकाव या लगाव। जब नायक-नायिका के मन में एक-दूसरे के प्रति प्रीति उत्पन्न होकर विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के योग से स्थायी भाव रति जाग्रत हो तो ‘शृंगार रस’ कहलाता है। इसके अन्तर्गत पति-पत्नी अथवा नायक-नायिका का वर्णन होता है। इसमें पर-पुरुष या पर-नारी के प्रेम-वर्णन का निषेध होता है। शृंगार
रस के अवयव निम्न प्रकार हैं।

स्थायी भाव — रति
आलम्बन विभाव — नायक अथवा नायिका
उददीपन विभाव — आलम्बन का सौन्दर्य, प्रकृति, चाँदनी, वसन्त ऋतु, वाटिका, संगीत इत्यादि
अनुभाव — स्पर्श, आलिंगन, अवलोकन, कटाक्ष, मुस्कान, अश्रु इत्यादि
संचारी भाव — निर्वेद, हर्ष, लज्जा, जड़ता, चपलता,
आशा, स्मृति, आवेग, उन्माद, रुदन इत्यादि

शृंगार रस के दो भेद हैं

(i) संयोग श्रृंगार मिलन या संयोग की अवस्था में जब नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन किया जाए तो वहाँ संयोग शृंगार होता है।

उदाहरण
“दूलह श्रीरघुनाथ बने दुलही सिय सुन्दरी मन्दिर माहीं।
गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि बेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं।।
राम को रूप निहारति जानकि कंकन के नग की परछाहीं।
यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही, पल टारत नाहीं।।”

तुलसीदास स्पष्टीकरण

उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव रति है। विषय-राम और आश्रय-सीता।
उद्दीपन-राम का नग में पड़ने वाला प्रतिबिम्ब, अनुभाव-नग में राम के प्रतिबिम्ब का अवलोकन करना, हाथ टेकना तथा संचारी भाव-हर्ष एवं जड़ता। इस प्रकार यहाँ ‘संयोग शृंगार’ है।

उदाहरण
कौन हो तुम वसन्त के दूत
विस्स पतझड़ में अतिसुकुमार;
घन तिमिर में चपला की रेख
तपन में शीतल मन्द बयार।

काव्यांजलि (श्रद्धा-मनु)

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘रति’ है। विषय-श्रद्धा और ।
आश्रय-मनु। उद्दीपन-एकान्त प्रदेश, श्रद्धा की कमनीयता और ।
शीतल-मन्द पवन। अनुभाव-हृदय में शान्ति का मिलना। एंगरी भाव-हर्ष और उत्सुकता। इस प्रकार यहाँ ‘संयोग शृंगार’ है।

2 वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार वियोग अथवा एक-दूसरे से दूर रहने –
की स्थिति में जब नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन किया जाता है, तब उसे – वियोग श्रृंगार कहते हैं।

उदाहरण
“मैं निज अलिन्द में खड़ी थी सखि एक रात
रिमझिम बूंदें पड़ती थीं घटा छाई थी।
गमक रही थी केतकी की गन्ध चारों ओर
झिल्ली झनकार यही मेरे मन भाई थी।
करने लगी मैं अनुकरण स्वनूपुरों से
चंचला थी चमकी घनाली घहराई थी।
चौंक देखा मैंने चुप कोने में खड़े थे प्रिय,
माई मुखलज्जा उसी छाती में छिपाई थी।”

मैथिलीशरण गुप्त (‘यशोधरा से)
स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव रति है। आलम्बन-उर्मिला।
उद्दीपन-घटा, बूंदें, फूल की गन्ध और झिल्लियों की झनकार। अनुभाव- छाती में मुख को छिपाना और संचारी भाव-हर्ष, लज्जा एवं स्मृति। अत: यहाँ ‘वियोग’ अथवा ‘विप्रलम्भ’ शृंगार है।

उदाहरण
हे खग-मृग, हे मधुकर लेनी,
तुम देखी सीता मृग नैनी?

तुलसीदास स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘रति’ है। आलम्बन-सीता जी।। उद्दीपन-सूनी कुटिया और वन का सूनापन। संचारी भाव है-सीता जी की स्मृति, विषाद, आवेग, दैन्य, मोह और शंका। अत: ‘वियोग’ अथवा ‘विप्रलम्भ’ शृंगार है।

2 हास्य रस

जब किसी (वस्तु अथवा व्यक्ति) की वेशभूषा, वाणी, चेष्टा, आकार।
इत्यादि में आई विकृति को देखकर सहज हँसी आ जाए तब वहाँ हास्य रस होता है।
हास्य रस के अवयव निम्न प्रकार हैं

स्थायी भाव — हास
आलम्बन — विकृत वस्तु अथवा व्यक्ति
उद्दीपन — आलम्बन की अनोखी आकृति, चेष्टाएँ, बातचीत
इत्यादि
अनुभाव — आश्रय की मुस्कान, आँखों का मिचमिचाना तथा
अट्टहास करना
संचारी भाव — हर्ष, निद्रा. आलस्य, चपलता, उत्सुकता, भ्रम,
कम्पन इत्यादि

उदाहरण
“बिन्ध्य के बासी उदासी तपो व्रतधारि महा बिनु नारि दुखारे।
गौतमतीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृन्द सुखारे।।।
है हैं सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायक जू! करुणा करि कानन को पगु धारे।।”

तुलसीदास
स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में विन्ध्य क्षेत्र में पहुँचे श्रीराम के चरण स्पर्श से पत्थर को सुन्दर नारी में परिवर्तित होते जान वहाँ विद्यमान नारियों से दूर रहने वाले तपस्वीगण के प्रसन्न होने का वर्णन है। इस पद्यांश में स्थायी भाव हास है। आलम्बन-राम और उद्दीपन-गौतम ऋषि की पत्नी का उद्धार। अनुभाव

-मुनियों की कथा आदि सूनाना और संचारी भाव-हर्ष, चंचलता एव
उत्सुकता। अत: यहाँ ‘हास्य रस’ है।

उदाहरण
नाना वाहन नाना वेषा।
बिहँसे सिव समाज निज देखा।।
कोउ मुख-हीन बिपुल मुख काहू।
बिन पद-कर कोउ बहु पद-बाहू।।

तुलसीदास
स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ह्रास है। आलम्बन-शिव समाज। उद्दीपन-विचित्र वेशभूषा। अनभाव-शिवजी का हँसना। संचारी भाव-हर्ष, रोमांच, चपलता आदि। अत: यहाँ ‘हास्य’ रस है।

3, करुण रस

जब प्रिय या मनचाही वस्तु के नष्ट होने या उसका कोई अनिष्ट होने पर हृदय शोक से भर जाए, तब ‘करुण रस’ जाग्रत होता है। इसमें विभाव, अनुभाव व संचारी भावों के मेल से शोक नामक स्थायी भाव का जन्म होता है। इसके अवयव निम्न प्रकार हैं

स्थायी भाव — शोक
आलम्बन — विनष्ट वस्तु अथवा व्यक्ति
उद्दीपन — आलम्बन का दाहकर्म, इष्ट की विशेषताओं का
उल्लेख, उसके चित्र एवं उससे सम्बद्ध वस्तुओं का वर्णन
अनुभाव — रुदन, प्रलाप, कम्प, मूर्छा, निःश्वास, छाता पीटना,
भूमि पर गिरना, दैवनिन्दा इत्यादि
संचारी भाव — निर्वेद, व्याधि, चिन्ता, स्मृति, मोह, अपस्मार,
ग्लानि, विषाद, दैन्य, उन्माद, श्रम इत्यादि

उदाहरण
“जो भूरि भाग्य भरी विदित थी अनुपमेय सुहागिनी,
हे हृदय बल्लभ! हूँ वही अब मैं यहाँ हत भागिनी।
जो साथिनी होकर तुम्हारी थी अतीव सनाथिनी,
है अब उसी मुझसी जगत् में और कोई अनाथिनी।”

मैथिलीशरण गुप्त
स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव शोक है। आलम्बन के अन्तर्गत विषय-अभिमन्यु का शव तथा आश्रय-उत्तरा। उत्तरा के द्वारा अभिमन्यु की वीरता की स्मृति उद्दीपन और अनुभाव-उसका चित्कार करना। संचारी भाव -स्मृति, चिन्ता, दैन्य इत्यादि। अत: यहाँ ‘करुण रस’ है।

उदाहरण
अभी तो मुकुट बँधा था माथ,
हुए कल ही हल्दी के हाथ,
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले थे चुम्बन शून्य कपोल,
हाय रुक गया यहीं संसार,
बना सिंदूर अनल अंगार,
वातहत लतिका वह सुकुमार
न्नाधार!

सुमित्रानन्दन पन्त
स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘शोक’ है। आलम्बन-विनष्ट
पति। अनुभाव-हवा से आहत लता के समान नायिका का आश्रहीन पड़े होना। उद्दीपन-मुकुट का बँधना, हल्दी के हाथ होना और लाज के बोलों का न खुलना। संचारी भाव-दैन्य, विषाद, स्मृति, जड़ता आदि। अत: यहाँ ‘करुण’ रस है।

4 वीर रस

युद्ध करने के लिए अथवा नीति, धर्म आदि की दर्दशा को मिटाने जैसे कठिन कार्यों के लिए मन में उत्पन्न होने वाले उत्साह से वीर रस की उत्पत्ति होती है। वीर रस के अवयव निम्नलिखित हैं।

स्थायी भाव — उत्साह
आलम्बन — शत्रु
उद्दीपन — शत्रु की शक्ति, अहंकार, रणवाद्य, यश की चाह,
याचक का आर्तनाद इत्यादि
अनुभाव — प्रहार करना, गर्वपूर्ण उक्ति, रोमांच, कम्प,
धर्मानुकूल आचरण करना इत्यादि
संचारी भाव — हर्ष, उत्सुकता, गर्व, चपलता, आवेग, उग्रता, मति, धृति, स्मृति, असूया इत्यादि

उदाहरण “चढ़त तुरंग, चतुरंग साजि सिवराज,
चढ़त प्रताप दिन-दिन अति जंग में।
भूषण चढ़त मरहट्अन के चित्त चाव,
खग्ग खुली चढ़त है अरिन के अंग में।
भौंसला के हाथ गढ़ कोट हैं चढ़त,
अरि जोट है चढ़त एक मेरू गिरिसुंग में।
तुरकान गम व्योमयान है चढ़त बिनु
मन है चढ़त बदरंग अवरंग में।”

भूषण स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव-उत्साह। औरंगजेब और तुरक आलम्बन विभाव हैं, जबकि शत्रु का भाग जाना, मर जाना उद्दीपन विभाव हैं। घोड़ों का चढ़ना, सेना सजाना, तलवार चलाना आदि अनुभाव हैं। उग्रता, क्रोध, चाव, हर्ष, उत्साह इत्यादि संचारी भाव हैं। अत: यहाँ ‘वीर रस’ का निष्पादन हुआ है।

उदाहरण
मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानों मुझे।
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे।।
है और की तो बात क्या, गर्व मैं करता नहीं।
मामा तथा निज तात से भी, युद्ध में डरता नहीं।।

मैथिलीशरण गुप्त स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘उत्साह है। आलम्बन-कौरव। आश्रय-अभिमन्यु। अनुभाव-अभिमन्यु के वाक्य। उद्दीपन-चक्रव्यूह की रचना। संचारी भाव-गर्व, उत्सुकता, हर्ष आदि। अत: यहाँ ‘वीर’ रस है।

5 रौद्र रस

विरोधी पक्ष की ओर से व्यक्ति, समाज, धर्म अथवा राष्ट्र की निन्दा या अपमान करने पर मन में उत्पन्न होने वाले क्रोध से रौद्र रस की उत्पत्ति होती है। रौद्र रस के अवयव निम्नलिखित हैं

स्थायी भाव — क्रोध
आलम्बन — विरोधी, अनुचित बात कहने वाला व्यक्ति
उद्दीपन — विरोधियों के कार्य एवं वचन
अनुभाव — शस्त्र चलाना, भौंहें चढ़ाना, दाँत पीसना, मुख
लाल करना, गर्जन, आत्म-प्रशंसा, कम्प, प्रस्वेद इत्यादि
संचारी भाव — उग्रता, अमर्ष, आवेग, उद्वेग, मद, मोह, असूया,
स्मृति इत्यादि

उदाहरण
“उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उनका लगा।
मानो हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।”

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव है-क्रोध एवं अभिमान
मारने वाला जयद्रथ आलम्बन है।अकेले बालक अभिमन्यु को चक्रव्यही फँसाकर सात महारथियों द्वारा आक्रमण करना उद्दीपन है। शरीर काँपना क्रोध करना, मुख लाल होना अनुभाव हैं तथा उग्रता, चपलता आदि संचार भाव हैं। अत: यह ‘रौद्र रस’ का उदाहरण है।

उदाहरण
भाखे लखनु कुटिल मई भौंहें।
रदपट फरकट नयन रिसौहें।।

तुलसीदास स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘क्रोध’। आलम्बन-राजा जनक। अनुभाव-भौंहें चढ़ाना, (लक्ष्मण का) मुँह का लाल होना। उद्दीपन है-राजा जनक के अपमान जनक कटु वचन। संचारी भाव-अमर्ष, आवेग, उग्रता आदि। अतः यहाँ ‘रौद्र’ रस है।

6 शान्त रस

तत्त्व-ज्ञान, संसार की क्षणभंगुरता तथा सांसारिक विषय-भोगों की असारता से उत्पन्न होने वाले वैराग्य से शान्त रस की उत्पत्ति होती है। शान्त रस के अवयव निम्नलिखित हैं

स्थायी भाव — निर्वेद
आलम्बन —- तत्त्व ज्ञान का चिन्तन एवं सांसारिक क्षणभंगुरता
उद्दीपन — शास्त्रार्थ, तीर्थ यात्रा, सत्संग इत्यादि
अनुभाव — पूरे शरीर में रोमांच, अश्रु, स्वतन्त्र होना इत्यादि।
संचारी भाव —- मति, धृति, हर्ष, स्मति, निर्वेद, विबोध इत्यादी

उदाहरण
“मन मस्त हुआ फिर क्यों डोले?
हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार-बार वाको क्यों खोले?”

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव निर्वेद है, ईश्वर विषय है
तथा कवि आश्रय है। ईश्वर भक्ति व सुलभ वातावरण उद्दीपन हैं तथा
ईश्वर की भक्ति में लीन होना, धन्यवाद करना, गाना आदि अनुभाव हैं। प्रसन्नता, विस्मय आदि प्रकट करना संचारी भाव हैं। अत: यहाँ ‘शान्त रस’ उपस्थित है।

उदाहरण
अब लौं नसानी अब न नसैहौं।
रामकृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिर न डसैहौं।।
पायो नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसै हौं।।
परबस जानि हँस्यों इन इन्द्रिन, निज बस हवै न हसैहौं।
मन-मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद-कमल बसैहौं।।

तुलसीदास स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘निर्वेद’ है। आलम्बन -तुलसीदास तथा श्रीराम की भक्ति। अनुभाव-राम के चरणों में रत होना, स्वतन्त्र होना और सांसारिक विषयों में निर्लिप्त न होना। उद्दीपन-सांसारिक असारता, श्रीराम की कृपा, इन्द्रियों द्वारा उपहास। संचारी भाव-हर्ष, स्मृति, निर्वेद आदि। अतः यहाँ ‘शान्त’ रस है।

7 अद्भुत रस

किसी असाधारण, अलौकिक या आश्चर्यजनक वस्तु, दृश्य या घटना देखने. मनने से मन का चकित होकर, ‘विस्मय’ स्थायी भाव का प्रादुर्भाव होना ‘अद्भुत की उत्पत्ति करता है। प्रायः जासूसी, तिलिस्मी, ईश्वर वर्णन आदि से सम्बन्धित साहित्य में अद्भुत रस पाया जाता है। अद्भुत रस के अवयव निम्नलिखित हैं

स्थायी भाव — विस्मय
आलम्बन — विस्मय उत्पन्न करने वाली वस्तु या व्यक्ति
उद्दीपन — अलौकिक वस्तुओं के दर्शन, श्रवण, कीर्तन इत्यादि
अनुभाव — रोमांच, गदगद होना, दाँतों तले अंगुली दबाना,
आँखें फाड़कर देखना, काँपना, आँसू आना इत्यादि
संचारी भाव —- हर्ष, उत्सुकता, मोह, धृति, भ्रान्ति, आवेग इत्यादि

उदाहरण
“अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु।’

काव्य कल्पद्रुम स्पष्टीकरण यशोदा, श्रीकृष्ण के मुख में समस्त ब्रह्माण्ड को देखकर विस्मित हो जाती हैं। उनके मुख से प्रसन्नता के शब्द निकल पड़ते हैं और उनकी आँखें फैल जाती हैं। इस प्रकार यहाँ स्थायी भाव विस्मय है, आलम्बन -कृष्ण का मुख एवं आश्रय-यशोदा। उद्दीपन-श्रीकृष्ण के मुख के अन्दर का दृश्य।
अनुभाव-गद्गद् वचन एवं आँखों का फैलना तथा संचारी भाव-विस्मय, आश्चर्य हर्ष आदि। अत: यहाँ ‘अद्भुत रस’ है।

उदाहरण
बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।।

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘विस्मय’ है। आलम्बन-उक्त
पंक्तियाँ। आश्रय-पाठक। उद्दीपन-बिना शरीर के कार्य का सम्पन्न होना। अत: यहाँ ‘शान्त’ रस है।

8 भयानक रस

किसी बात को सुनने, किसी वस्तु, व्यक्ति को देखने अथवा उसकी कल्पना करने से मन में भय छा जाए, तो उस वर्णन में भयानक रस विद्यमान रहता है। भयानक रस के अवयव निम्नलिखित हैं
स्थायी भाव — भय
आलम्बन — भयंकर वस्तु अथवा हिंसक पशुओं के दर्शन आदि।
उद्दीपन —- भयावह स्वर, भयंकर चेष्टाएँ आदि
अनुभाव — मूर्छा, रुदन, पलायन, पसीना छूटना, कम्पन, मुँह
सूखना, चिन्ता करना इत्यादि
संचारी भाव —- चिन्ता, त्रास, सम्मोह, सम्भ्रम, दैन्य इत्यादि

उदाहरण “एक ओर अजगरहिं लखि एक ओर मृगराय।
विकल बटोही बीच ही पर्यो मूरछा खाय।।”

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव भय है, राहगीर आश्रय है तथा भयानक जंगल आलम्बन है। वन्य जीवों जैसे-अजगर. मगराज सिंह का राहगीर की ओर बढ़ना उद्दीपन विभाव हैं। डरना, मूच्छित होना अनुभाव हैं तथा जड़ता, त्रास, चिन्ता आदि संचारी भाव हैं। अत: यह ‘भयानक रस’ का उदाहरण है।

उदाहरण
लंका की सेना तो कपि के गर्जन-रव से काँप गई।
हनुमान के भीषण दर्शन से विनाश ही भाँप गई।।
उस कंपित शंकित सेना पर कपि नाहर की मार पड़ी।
त्राहि-त्राहि शिव त्राहि-त्राहि की चारों ओर पुकार पड़ी।

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘भय’ है। आश्रय-लंका की
सेना। आलम्बन-हनुमान। अनुभाव-कम्पन त्राहि-त्राहि करना।
उद्दीपन-गर्जन-रव और भीषण दर्शन। संचारी भाव-चिन्ता, शंका,
सन्त्रास आदि। अत: यहाँ ‘भयानक’ रस है।

9 वीभत्स रस

जुगुप्साजनक या घृणा उत्पन्न करने वाली वस्तुओं अथवा परिस्थितियों को देख-सुनकर मन में उत्पन्न होने वाले भाव वीभत्स रस को उत्पन्न करते हैं। काव्य में इस रस का प्रयोग परिस्थिति के अनुरोध से हुआ है। वीभत्स रस के अवयव निम्नलिखित हैं
स्थायी भाव — जुगुप्सा
आलम्बन —- रक्त, अस्थि, दुर्गन्धयुक्त मांस इत्यादि।
उद्दीपन — शव का सड़ना, उसमें कीड़े लगना, पशुओं,
पक्षियों द्वारा उन्हें नोचना, खाना इत्यादि।
अनुभाव —- घृणा करना, मुंह बनाना, थूकना, नाक को टेढ़ा
करना इत्यादि।
संचारी भाव —- ग्लानि, मोह, शंका, व्याधि, चिन्ता, जड़ता,
वैवर्ण्य, आवेग इत्यादि

उदाहरण
“सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द कर धारत।।
गीध जाँघ कहँ खोदि-खोदि के मांस उचारत।।
स्वान आँगुरिन काटि-काटि के खात विचारत।।
बहु चील नोच लै जात तुच मोद भर्यो सबको हियो।
मनु ब्रह्मभोज जजिमान कोउ आज भिखारिन कहँ दियो।”

स्पष्टीकरण यहाँ श्मशान में सेवारत राजा हरिश्चन्द्र का वर्णन किया गया है, जिन्हें पशु-पक्षियों द्वारा शव को नोच-नोचकर खाते देख मन में जुगुप्सा (घृणा) पैदा होती है। यहाँ स्थायी भाव जुगुप्सा है। श्मशान का दृश्य आलम्बन है व पाठक आश्रय हैं। कौए द्वारा आँख निकालना, सियार द्वारा जीभ खींचना उद्दीपन हैं। राजा हरिश्चन्द्र द्वारा इनका वर्णन अनुभाव है तथा संचारी भाव
-मोह, स्मृति आदि। अत: यहाँ ‘वीभत्स रस’ है।…

उदाहरण
” ‘ओझरी की झीरी काँधे आँतनि की सेल्ही बाँधे,’
मूड के कमण्डल खपर किए कोरिकै।।
जोगिन झुदुन झुण्ड-झुण्ड बनी तापसी-सी,
तीर तीर बैठी सो समर सरि खोरि कै।
स्रोनित सौ सानि-सानि गूदा खात सतुआ से,
प्रेत एक वियत बहोरि घोरि-घोरि कै।।
‘तुलसी’ बैताल भूत, साथ लिए भूतनाथ,
हेरि-हेरि हँकेत है, हाथ जोर कै।

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) है। आलम्बन -मूड के कमण्डल, श्मशान आदि। आश्रय-पाठक या दर्शक। अनुभाव- नाक, मुँह सिकोड़ना, छि: छि: करना, थूकना आदि। उद्दीपन-दुर्गन्ध कीड़ों का गिजमिजाना, गूदा खाना आदि। सांचारी भाव-ग्लानि, त्रास, शंका आदि।

10 वात्सल्य रस

वात्सल्य रस का सम्बन्ध छोटे बालक-बालिकाओं के प्रति प्रेम एवं ममता से है। छोटे बालक-बालिकाओं की मधुर चेष्टा, उनकी बोली के प्रति माता-पिता तथा पड़ोसियों का स्नेह, प्यार आदि वात्सल्य रस की उत्पत्ति करते हैं। वात्सल्य रस के अवयव निम्नलिखित हैं
स्थायी भाव — स्नेह (वात्सल्यता)
आलम्बन — सन्तान, शिष्य आदि
उद्दीपन — बाल-हठ, बालक की चेष्टाएँ, तुतलाना, उसका
रूप एवं उसकी वस्तुएँ
अनुभाव —- बच्चों को गोद लेना, थपथपाना, आलिंगन
करना, सिर पर हाथ फेरना इत्यादि
संचारी भाव — हर्ष, आवेग, गर्व, मोह, शंका, चिन्ता इत्यादि

उदहारण
“सोहित कर नवनीत लिए
घुटुरून चलत रेनु तन मण्डित
मुख दधि लेप किए।।”

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव स्नेह (वात्सल्यता) है.
बालक कृष्ण आलम्बन विभाव हैं तथा माता-पिता आश्रय हैं। बालकृष्ण का घुटनों तक धूल से भरा शरीर होना, मँह पर दही का लेप आदि होना उद्दीपन विभाव हैं। हँसना, प्रसन्न होना इत्यादि अनुभाव हैं। विस्मित होना, मुग्ध होना इत्यादि संचारी भाव हैं। इस प्रकार यह ‘वात्सल्य रस’ का उदाहरण है।

उदाहरण
स्याम गौर सुन्दर दोऊ जोरी।
निरखहिं छवि जननी तन तोरी।।
कबहूँ उछंग कबहुँ वर पलना।
मातु दुलारहूँ कहि प्रिय ललना।

स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘वत्सलता’ है।
आलम्बन-शिशु राम और उनके भाई। आश्रय-माताएँ।
अनुभाव-दुलारना, पालने में झुलाना, गोद में लेना। उद्दीपन-वेशभूषा,
शिशुओं की सुन्दरता, शिशुओं का घुटनों और हाथों के बल चलना। संचारी भाव-हर्ष, गर्व, शंका आदि। अत: यहाँ ‘वात्सल्य’ रस है।

11 भक्ति रस

भगवद्-अनुरक्ति तथा अनुराग के वर्णन से भक्ति रस की उत्पत्ति होती है। प्राचीन आचार्य इसे भगवद्-विषयक रति मानकर श्रृंगार रस के अन्तर्गत । रखते थे।

भक्ति रस के अवयव निम्नलिखित हैं

स्थायी भाव — भगवद्-विषयक रति
आलम्बन —- राम-सीता, कृष्ण-राधा इत्यादि।
उद्दीपन — परमेश्वर के कार्यकलाप, सत्संग आदि।
अनुभाव — भगवद भजन, कीर्तन, ईश्वर-मग्न होकर हँसना-रोना,
नाचना इत्यादि।
संचारी भाव —- निर्वेद, हर्ष, वितर्क, मति इत्यादि ।

उदाहरण
“अँसुबन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई।
‘मीरा’ की लगन लागी, होनी हो सो होई।।”

मीरा स्पष्टीकरण यहाँ स्थायी भाव श्रीकृष्ण के प्रति मीरा का अनुराग है। आलम्बन-श्रीकृष्ण एवं सत्संग उद्दीपन है। आँसुओं से प्रेमरूपी बेलि का बोना और उसे सींचना अनुभाव हैं तथा हर्ष, शंका आदि संचारी भाव हैं। अत: यहाँ ‘भक्ति रस’ है।

उदाहरण
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोउ।
जाके सिर मारे मुकुट मेरो पति सोई।।

मीरा स्पष्टीकरण उक्त पंक्तियों में स्थायी भाव ‘अनुराग’ है। आलम्बन -श्रीकृष्ण। अनुभाव-स्वामी के रूप में श्रीकृष्ण को स्वीकारना भगवान का भजन गाती आदि। उद्दीपन_सत्संग। संचारी भाव-हर्ष शंका आदि। अतः यहाँ ‘भक्ति’ रस है।

स्थायी भाव तथा संचारी भावों में पारस्परिक सम्बन्ध

रसस्थायी भावसंचारी भाव
श्रृंगाररतिस्मृति, चिन्ता, हर्ष, मोह इत्यादि।
हास्यहासहर्ष, निद्रा, आलस्य, चपलता इत्यादि।
करुणशोकग्लानि, शंका, चिन्ता, दीनता इत्यादि।
रौद्रक्रोधउग्रता, शंका, स्मृति इत्यादि।
वीरउत्साहआवेग, हर्ष, गर्व इत्यादि।
भयानकभयत्रास, ग्लानि, शंका, चिन्ता इत्यादि।
वीभत्सजुगुप्सादीनता, निर्वेद, ग्लानि इत्यादि।
अद्भुतविस्मयहर्ष, स्मृति, आवेग, शंका इत्यादि।
शान्तनिर्वेद (वैराग्य)हर्ष, स्मृति, धृति इत्यादि।
वात्सल्यवत्सलताचिन्ता, शंका, हर्ष, स्मृति इत्यादि।
भक्तिभगवद् विषयक रतिनिर्वेद, हर्ष, वितर्क, मति इत्यादि।

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