NCERT Solutions for Class 12 Sahityik Hindi Notes in Hindi

कक्षा 12 साहित्यिक हिंदी गद्य गरिमा अध्याय 1 वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र का स्वरूप  हिंदी में

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi

यदि आप 12 वीं कक्षा में पढ़ रहे हैं और अपने स्कूली जीवन की अंतिम परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो आप सभी को शुभकामनाएँ। आपको इसकी बुरी तरह आवश्यकता होगी। आखिरकार, यह परीक्षा आपके जीवन में निर्धारण कारक की भूमिका निभाने वाली है। एक तरफ, यह परीक्षा आपके लिए पढ़ाई की सही स्ट्रीम चुनने में आसान बनाएगी जो आपके लिए एकदम सही होगी।

 

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 1 राष्ट्र का स्वरूप वासुदेवशरण अग्रवाल जीवन-परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियां ?

जीवन-परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व के विद्वान वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म वर्ष 1904 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के खेड़ा’ नामक ग्राम में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद एम.ए. पी.एच.डी. तथा डी.लिट की उपाधि इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इन्होंने पालि, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं एवं उनके साहित्य का गहन अध्ययन किया। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में ‘पुरातत्त्व एवं प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे। वासुदेवशरण अग्रवाल दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय के भी अध्यक्ष रहे। हिन्दी की इस महान् विभूति का वर्ष 1967 में स्वर्गवास हो गया।

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi Prose Chapter 1 Nature of the Nation Vasudevsharan Agarwal Life Introduction and Literary Achievements?

Biography and Literary Achievements
Vasudev sharan Agarwal, a scholar of Indian culture and archeology, was born in the year 1904 in a village called ‘Kheda’ in Meerut district of Uttar Pradesh. After graduating from Banaras Hindu University, M.A. PHD. And he obtained the degree of D.Lit from Lucknow University. He studied Pali, Sanskrit, English etc. languages ​​​​and their literature deeply. He was the head of the Department of Archeology and Ancient History in Bharati Mahavidyalaya of Banaras Hindu University. Vasudevsharan Agrawal was also the President of National Museum, Delhi. This great personality of Hindi passed away in the year 1967.

यूपी बोर्ड सॉल्यूशंस for कक्षा 12 साहित्यिक हिंदी गद्य गद्य गरिमा अध्याय 1 राष्ट्र का स्वरूप वासुदेवशरण अग्रवाल की साहित्यिक सेवाएँ ?

साहित्यिक सेवाएँ
इन्होंने कई ग्रन्थों का सम्पादन व पाठ शोधन भी किया जायसी के ‘पद्मावत’ की संजीवनी व्याख्या और बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ का सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत करके इन्होंने हिन्दी साहित्य को गौरवान्वित किया। इन्होंने प्राचीन महापुरुषों-श्रीकृष्ण, वाल्मीकि, मनु आदि का आधुनिक दृष्टिकोण से बुद्धिसंगत चरित्र-चित्रण प्रस्तुत किया।

UP Board Solutions for Class 12 Literary Hindi Prose Prose Garima Chapter 1 Nature of the Nation Literary Services of Vasudevsharan Agarwal ?

Literary Services
He also edited and recited many texts, he made Hindi literature proud by presenting the Sanjivani interpretation of ‘Padmavat’ of Jayasi and cultural study of ‘Harshacharit’ of Banabhatta. 
He presented a rational characterization of ancient great men – Shri Krishna, Valmiki, Manu etc. from a modern point of view

वासुदेवशरण अग्रवाल की कृतियाँ ?

कृतियाँ
डॉ. अग्रवाल ने निबन्ध-रचना, शोध और सम्पादन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
निबन्ध संग्रह पृथिवी पुत्र, कल्पलता, कला और संस्कृति, कल्पवृक्ष, भारत की एकता, माता भूमि, वाग्धारा आदि।
शोध पाणिनिकालीन भारत।
म्पादन जायसीकृत पद्मावत की संजीवनी व्याख्या, बाणभट्ट के हर्षचरित का सांस्कृतिक अध्ययन। इसके अतिरिक्त इन्होंने संस्कृत, पालि और प्राकृत के अनेक ग्रन्थों का भी सम्पादन किया।

Works of Vasudevsharan Agarwal ?

Works
Dr. Aggarwal has done important work in the field of essay writing, research and editing. 
His major works are as follows-
Essay collection Earth son, Kalpalata, Art and culture, Kalpavriksha, Unity of India, Mother land, Vagdhara etc.
Research Panini’s India.
Sanjivani interpretation of Padmavat, a cultural study of Banabhatta’s Harshacharita. 
Apart from this, he also edited many texts of Sanskrit, Pali and Prakrit.

राष्ट्र का स्वरूप – पाठ का सार ?

परीक्षा में ‘पाठ का सार’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।
प्रस्तुत निबन्ध डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के निबन्ध संग्रह ‘पृथिवीपुत्र’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने राष्ट्र के स्वरूप को तीन तत्वों के सम्मिश्रण से निर्मित माना है-पृथ्वी (भूमि), जन (मनुष्य) और संस्कृति।

Nature of the Nation – Essence of the Lesson?

No question is asked in the exam related to the ‘summary of the lesson’. It is given only for the purpose of explaining the lesson to the students.
The present essay has been taken from the essay collection ‘Prithviputra’ by Dr. Vasudevsharan Agrawal. In this, the author has considered the nature of the nation to be made up of a mixture of three elements – Prithvi (land), Jana (man) and culture.

पृथ्वी : हमारी धरती माता?

पृथ्वी : हमारी धरती माता
लेखक का मानना है कि यह पृथ्वी, भूमि वास्तव में हमारे लिए माँ है, क्योंकि इसके द्वारा दिए गए अन्न-जल से ही हमारा भरण-पोषण होता है। इसी से हमारा जीवन अर्थात् अस्तित्व बना हुआ है। धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी पड़ी हैं, उनसे हमारा आर्थिक विकास सम्भव हुआ है और आगे भी होगा। पृथ्वी एवं आकाश के अन्तराल में जो सामग्री भरी हुई है, पृथ्वी के चारों ओर फैले गम्भीर सागर में जो जलघर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सबका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव । अतः हमें इन सबके प्रति आत्मीय चेतना रखने की आवश्यकता है। इससे हमारी राष्ट्रीयता की भावना को विकसित होने में सहायता मिलती है।

Earth: Our Mother Earth?

Earth: Our Mother Earth
The author believes that this earth, the land is actually the mother for us, because we are fed only by the food and water given by it. This is how our life i.e. existence is made. Our economic development has become possible because of the invaluable funds that are lying in the womb of Mother Earth and will continue to do so. The material that is filled in the gap between the earth and the sky, the water bodies and the zodiac signs in the deep ocean spread around the earth, all of them have a profound effect on our life. So we need to have a soulful consciousness towards all these. This helps in developing our sense of nationalism.

राष्ट्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग : जन (मनुष्य) ?

राष्ट्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग : जन (मनुष्य)
लेखक का मानना है कि पृथ्वी अर्थात् भूमि तब तक हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं हो सकती, जब तक इस भूमि पर निवास करने वाले जन को साथ में जोड़कर न देखा जाए। पृथ्वी माता है और इस पर रहने वाले जन अर्थात् मनुष्य इसकी सन्तान। जनों का विस्तार व्यापक है और इनकी विशेषताएँ भी विविध हैं। वस्तुतः जन का महत्त्व सर्वाधिक है। राष्ट्र जन से ही निर्मित होता है। जन के बिना राष्ट्र की कल्पना असम्भव है। ये जन अनेक उतार-चढ़ाव से जूझते हुए, कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ने के लिए कृत संकल्प रहते हैं। इन सबके प्रति आत्मीयता की भावना हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ करती है।

The most important and living part of the nation: Jan (man)?

The most important and living part of the nation: Jan (man)
The author believes that the earth i.e. the land cannot be important to us until the people living on this land are not seen together. Earth is the mother and the people living on it i.e. human beings are its children. The range of people is wide and their characteristics are also varied. In fact, the importance of the people is the highest. The nation is made up of the people. It is impossible to imagine a nation without people. These people are determined to move forward in the face of difficulties, fighting many ups and downs. The feeling of affinity towards all these strengthens the feeling of nationalism in us.

संस्कृति : जन (मनुष्य) के जीवन की श्वास-प्रश्वास?

संस्कृति : जन (मनुष्य) के जीवन की श्वास-प्रश्वास
लेखक का मानना है कि यह संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है और सरकृति के विकास एवं अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। अनेक संस्कृतियों के रहने के बावजूद सभी संस्कृतियों का मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता एवं समन्वय की भावना है। यही हमारे बीच पारस्परिक प्रेम एवं भाई-चारे का स्रोत है और इसी से राष्ट्रीयता की भावना को बल मिलता है।
लेखक का मानना है कि सहृदय व्यक्ति प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनन्दित होता है। लेखक का मानना है कि अपने पूर्वजों से प्राप्त परम्पराओं, रीति-रिवाजों को बोझ न समझकर उन्हें सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। उन्हें भविष्य की उन्नति का आधार बनाकर ही राष्ट्र का स्वाभाविक विकास सम्भव है।

Culture: The breath of life of the people (man)?

Culture: Breathing of life of the people
The author believes that this culture is the mind of the people and the growth of the nation is possible only through the development and emergence of the state. Despite the existence of many cultures, the basic basis of all cultures is the spirit of mutual tolerance and coordination. This is the source of mutual love and brotherhood between us and this gives strength to the feeling of nationalism.
The author believes that the warm-hearted person accepts the joy side of every culture and rejoices with it. The author believes that the traditions and customs received from their ancestors should not be considered a burden and they should be accepted happily. The natural development of the nation is possible only by making them the basis of future progress.

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर – Interpretation based Q&A based on passages

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं?

उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश ‘राष्ट्र का स्वरूप’ पाठ से लिया गया है तथा इसके लेख ‘वासुदेवशरण अग्रवाल’ हैं।

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हमें उम्मीद है कि कक्षा 12 के साहित्यिक हिंदी के गद्य गरिमा अध्याय 1 वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र का स्वरूप नोट्स हिंदी में आपकी मदद करेंगे। यदि आपके पास कक्षा 12 के साहित्यिक हिंदी Class 12 Sahityik Hindi chapter 1 Vasudevsharan Agrawal Model paper नोट्स हिंदी में के लिए के बारे में कोई प्रश्न है, तो नीचे एक टिप्पणी छोड़ दें और हम जल्द से जल्द आपके पास वापस आ जाएंगे।

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