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UP board syllabus धर्मवीर भारती – परिचय साँझ के बादल

BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी पद्य- विविधा – धर्मवीर भारती – साँझ के बादल
Chapter 11
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameupboarmaster.com

संक्षिप्त परिचय

नामधर्मवीर भारती
जन्म1926 ई. में इलाहाबाद
शिक्षाइलाहाबाद विश्वविद्यालय से पी.एच.डी.
कृतियाँकाव्य रचनाएँ ठण्डा लोहा, सात गीत वर्ष,अन्धा युग, कनुप्रिया। उपन्यास गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा। कहानी चाँद और टूटे हुए लोग। निबन्ध ठेले पर हिमालय। नाटक व एकांकी नदी प्यासी थी, नीली झील।
आलोचनात्मक ग्रन्थ साहित्य, मानव-मूल्य आदि।
उपलब्धियाँभारत-भारती, व्यास सम्मान, पद्मश्री आदि सम्मानों से सम्मानित किया गया।
मृत्यु1997 ई.

जीवन परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ

हिन्दी काव्य में अपनी तीक्ष्ण आधुनिक दृष्टि, स्वच्छन्द प्रवृत्ति एवं व्यक्तिवादी चेतना के लिए प्रख्यात धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर 1926 में इलाहाबाद में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. करने के बाद ये इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही हिन्दी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। 1959 में बम्बई से प्रकाशित होने वाले हिन्दी के प्रतिष्ठित साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ का सम्पादन का भार भीइनके कन्धों पर आया। इन्होंने धर्मयुग को व्यावसायिक स्तर से ऊँचा उठाकर उसमें सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, लोकप्रिय एवं कलात्मक विषयों को समाविष्ट कर उसे एक उच्च आदर्श पर पहुँचाया। ‘भारत-भारती’, ‘व्यास सम्मान’, ‘पद्मश्री’ आदि सम्मानों से सम्मानित इस महान् साहित्यकार का 5 सितम्बर, 1997 को निधन हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ

धर्मवीर भारती के जीवन पर साहित्यिक वातावरण का प्रभाव बाल्यकाल से ही पड़ने लगा था। निराला, पन्त, महादेवी वर्मा और डॉ. रामकुमार वर्मा जैसे महान् साहित्यकारों के सम्पर्क से उन्हें साहित्य-सृजन की प्रेरणा प्राप्त हुई और उनकी प्रतिभा में भी निखार आया। वे एक प्रतिभाशाली कवि विचारक, नाटककार,
अद्वितीय कथाकार, निबन्धकार, एकांकीकार, आलोचक और नीर-क्षीर विवेकी सम्पादक थे। उन्होंने रेखाचित्र, यात्रावृत्त, संस्मरण आदि अन्य विधाओं पर अपनी लेखनी चलाकर अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया।

कृतियाँ

काव्य रचनाएँ ठण्डा लोहा, सात गीत वर्ष, अन्धा युग, कनुप्रिया आदि। उपन्यास गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा।
कहानी-संग्रह चाँद और टूटे हुए लोग।
निबन्ध-संग्रह कहनी-अनकहनी, पश्यन्ती, ठेले पर हिमालय।
नाटक नदी प्यासी थी। एकांकी संग्रह नीली झील।
आलोचना ग्रन्थ साहित्य, मानव-मूल्य।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. स्वच्छन्दता भारती जी ने अपने काव्य में भावों को बड़ी सरलता एवं स्पष्टता के साथ व्यक्त किया है।
    इन्होंन भाव-चित्रण एवं दृश्य-चित्रण में नवीन उदभावनाओं का परिचय दिया है। उनकी प्रारम्भिक कृति ‘ठण्डा लोहा से लेकर कनप्रिया’ तथा सभी में स्वच्छन्दता की प्रवृति’ विद्यमान है।
  2. मांसलता का पुट प्रयोगवादी भारती जी की कविताओं में प्रणय भाव में मांसलता का पुट विद्यमान है।
  3. प्रकृति चित्रण भारती जी की कविताओं में प्रकृति चित्रण का विनियोजन मानवीय भावनाओं को उदीप्त करने तथा आलंकारिक रूप में हुआ है।

कला पक्ष

  1. भाषा भारती जी की भाषा साहित्यिक होते हुए भी सहज और सरल खड़ी बोली है। इन्होंने अपनी भाषा में तद्भव और विदेशी शब्दावली का उन्मुक्त रूप से प्रयोग किया है।
  2. अप्रस्तुत योजना अप्रस्तुत योजना की दृष्टि से भारतीजी ने परम्परागत और नवीन दोनों ही प्रकार के उपमानों की योजना की है।
  3. प्रतीक योजना प्रतीक योजना की दृष्टि से भारती जी की कविताएँ पर्याप्त समृद्ध हैं, पौराणिक प्रतीकों की योजना में भारती जी सिद्ध-हस्त हैं।
  4. बिम्ब और मिथक भारती जी के काव्य में बिम्बों और मिथकों का बड़ा ही सार्थक प्रयोग देखने को मिलता है। उनके गीत नाटय ‘अन्धा यग’ मिथक की दृष्टि से छायावादोत्तर काल की सबलतम कृति है। बिम्ब निर्माता में भारती जी की अभिरुचि प्राकृतिक उपादानों के प्रयोग की ओर अधिक रही है।
  5. अलंकार भारती जी के अलंकार प्रयोग में भी नवीनता के दर्शन होते हैं।

हिन्दी साहित्य में स्थान

धर्मवीर भारती बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार हैं। इनकी रचनाओं में मन और सामूहिक चेतना दोनों को ही अभिव्यक्ति हुई है। इन्हें आधुनिक युग के विशिष्ट रचनाकार के रूप में सम्मान प्राप्त है।

पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्या

साँझ के बादल

  1. ये अनजान नदी की नावें।
    जादू के-से पाल उड़ाती आतीं मन्थर चाल!
    नीलम पर किरनों की साँझी
    एक न डोरी एक न माँझी फिर भी लाद
    निरन्तर लातीं सेन्दुर और प्रवाल!
    कुछ समीप की कुछ सुदूर की कुछ चन्दन की
    कुछ कपूर की कुछ में गेरु, कुछ में रेशम
    कुछ में केवल जाल! ये अनजान नदी की नावें
    जादू के-से पाल उड़ाती आतीं मन्थर चाल!
    शब्दार्थ मन्थर धीमी; माँझी-मल्लाह, केवट; सेन्दुर-सिन्दूर; प्रवाल-मूंगा;

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता ‘साँझ के बादल’, धर्मवीर भारती द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘सात गीत-वर्ष’ से उद्धृत है।

प्रसंग भारती जी ने इस कविता में साँझ के बादलों को पालों वाली नावों जैसा चित्रित किया है, जिसमें बहुत सी रंगीन छवियाँ एवं आकृतियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं।

व्याख्या कवि सन्ध्याकालीन बादलों के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहता है। कि ये बादल अनजान नदी की नावें हैं, जो धीमी गति से जादू के पालों को उड़ाती हुई चली जा रही हैं अर्थात जिस प्रकार नदी में पानी के बहाव के साथ सब कुछ बहकर चला जाता है उसी प्रकार बादलरूपी अनजान नदी की नावे अपने साथ सभी कुछ बहाती हुई चलती हैं। ये नावें नीलम की किरणों की साँझी सजाती हैं। इसमें न तो डोरी है और न ही कोई मल्लाह, किन्तु फिर भी य बादलरूपी नावें सिन्दूर और मँगा को अपने साथ लादकर लाती है। कहने का आशय यह है कि बादलरूपी नावें बिना किसी के सहयोग के अपने साथ सब
कुछ बहा लाती हैं। आगे कवि कहते हैं कि इन बादलरूपी नावों में विभिन्न प्रकार की नावें हैं, कुछ नावें निकट की हैं, तो कुछ दूर की, कुछ चन्दन की तो कुछ कपूर की, कुछ गेरू तो कुछ रेशम की और कुछ केवल जाल की जो दृष्टि को भ्रमित कर बाँधने का कार्य करती हैं। कवि कहता है कि ये अनजान/अपरिचित नदी की नावें हैं, जो जादू के पाल उड़ाती हई धीमी गति से चली आ रही हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष

(i)प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्रकृति के गत्यात्मक रूप के चित्रण के साथ ही अपनी वर्णन-शक्ति की सजीवता को प्रदर्शित किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा गत्यात्मक खड़ीबोली शैली चित्रात्मक एवं वर्णनात्मक
छन्द मुक्त अलंकार उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक
गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

पद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

साँझ के बादल

  1. ये अनजान नदी की नावें जादू के-से पाल
    उड़ाती आतीं मन्थर चाल! नीलम पर किरनों की साँझी
    एक न डोरी एक न माँझी फिर भी लाद
    निरन्तर लाती सेन्दुर और प्रवाल!
    कुछ समीप की कुछ सुदूर की।
    कुछ चन्दन की कुछ कपूर की कुछ में गेरु,
    कुछ में रेशम कुछ में केवल जाल!
    ये अनजान नदी की नावें जादू के-से पाल
    उड़ाती आतीं मन्थर चाल!

उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश काव्य पंक्तियों के रचनाकार एवं रचना का नाम
लिखिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश पंक्तियाँ ‘धर्मवीर भारती’ द्वारा रचित ‘सात गीत-वर्ष’ काव्य संग्रह में संकलित कविता ‘साँझ के बादल’ से अवतरित है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के केन्द्रीय भाव पर प्रकाश डालिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्रकृति के गत्यात्मक रूप के चित्रण के साथ ही अपनी वर्णन-शक्ति की सजीवता को प्रदर्शित करते हुए ‘साँझ के बादलों को पालों वाली नावों जैसा चित्रित किया है, जिसमें बहुत-सी रंगीन छवियाँ एवं आकृतियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं।

(iii) कवि ने सन्ध्याकालीन बादलों के सौन्दर्य का वर्णन किस रूप में किया है?
उत्तर कवि सन्ध्याकालीन बादलों के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहता है कि ये बादल अनजान नदी की नावें हैं, जो धीमी गति से जादू के पालों को उड़ाती हुई चली जा रही है अर्थात जिस प्रकार नदी में पानी के बहाव के साथ सब कुछ बहकर चला जाता है, उसी प्रकार बादलरूपी अनजान नदी की नावें अपने साथ सभी कुछ बहाती हुई चलती हैं।

(iv) कवि ने बादलरूपी नावों के किन-किन रूपों का वर्णन किया है?
उत्तर कवि के अनुसार बादलरूपी नावों में विभिन्न प्रकार की नावें हैं, कुछ नावें निकट की हैं, तो कुछ दूर की, कुछ चन्दन की तो कुछ कपूर की, कुछ गेरू तो कुछ रेशम की और कुछ केवल जाल की, जो दृष्टि को भ्रमित कर बाँधने का कार्य । करती है।

(v) “प्रवाल’ और ‘सुदूर’ शब्दों में से उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
उत्तर प्रवाल में ‘प्र’ उपसर्ग और सुदूर में ‘सु’ उपसर्ग है।

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