NCERT Solutions for Class 12 Sahityik Hindi Notes in Hindi

NCERT Solutions for Class 12 Sahityik Hindi Notes in Hindi यूपी बोर्ड सॉल्यूशंस कक्षा 12 साहित्यिक हिंदी पद्य अध्याय 5 जयशंकर प्रसाद – परिचय – गीत -श्रद्धा-मनु के नोट्स हिंदी में

कक्षा 12 साहित्यिक हिंदी अध्याय 5 जयशंकर प्रसाद – परिचय – गीत -श्रद्धा-मनु  हिंदी में

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi

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दूसरी ओर, कक्षा 12 का परिणाम यह दर्शाता है कि आप स्कूल में अपने शुरुआती दिनों से भी कितने सुसंगत छात्र थे। इसलिए, ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे आप बोर्डों की तैयारी के दौरान आराम करने के बारे में सोच सकें। आपको यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त मील जाना होगा कि आप अच्छी तरह से स्कोर कर रहे हैं और अपने साथियों से प्रतियोगिता में आगे बने हुए हैं।

अब, जब आप अपने बोर्डों में एक असाधारण परिणाम करने की सोच रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि आप इसे करने का सही तरीका खोजने के बारे में सोचें। तो, यह क्या हो सकता है? ठीक है, यदि आप वास्तव में अच्छा स्कोर करने के इच्छुक हैं, तो यह आवश्यक है कि आप कक्षा 12 के लिए एनसीईआरटी के समाधान पर अपना हाथ डालें।

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जयशंकर प्रसाद – परिचय – गीत -श्रद्धा-मनु
BoardUP Board
Text bookNCERT
SubjectSahityik Hindi
Class 12th
हिन्दी पद्य-जयशंकर प्रसाद – परिचय – गीत -श्रद्धा-मनु
Chapter 5
CategoriesSahityik Hindi Class 12th
website Nameयूपीबोर्डसॉल्यूशंस.com

संक्षिप्त परिचय

नामजयशंकर प्रसाद
जन्म1889 ई. में काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश
पिता का नाम श्री देवी प्रसाद साहू
शिक्षाबनारस के क्वीन्स कॉलेज से आठवीं तक की शिक्षा।
कृतियाँकाव्य संग्रह कामायनी, आँसू, लहर, झरना,
चित्राधार,प्रेम पथिक। नाटक स्कन्दगुप्त,
चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ,
एक घुट, विशाख, अजातशत्रु, राज्यश्री, कामना,
प्रायश्चित आदि। कहानी संग्रह प्रतिध्वनि, छाया, आकाशदीप, आँधी, इन्द्रजाल। उपन्यास कंकाल,
तितली, इरावती। निबन्ध संग्रह काव्य कला तथा
अन्य निबन्धा
उपलब्धियाँ नागरी प्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष :
‘कामायनी’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक।
मृत्यु1937 ई.

जयशंकर प्रसाद जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

छायावाद के प्रवर्तक एवं उन्नायक महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म काशा क अत्यन्त प्रतिष्ठित सुँघनी साह के वैश्य परिवार में 1889 ई. में हुआ था। इनके दादा जी का नाम शिवरत्न साह और पिताजी का नाम देवी प्रसाद साहू था। माता-पिता एवं बड़े भाई के देहावसान के कारण अल्पायु में ही प्रसाद जी को व्यवसाय एवं परिवार के समस्त उत्तरदायित्वों को वहन करना पड़ा। घर पर ही
अंग्रेजी, हिन्दी, बांग्ला, उर्दू, फारसी, संस्कृत आदि भाषाओं का गहन अध्ययन किया। तत्पश्चात् इन्होंने बनारस के ‘क्वीन्स कॉलेज में दाखिला लेकर मात्र आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त की। अपने पैतृक कार्य को करते हुए भी इन्होंने अपने भीतर काव्य-प्रेरणा को जीवित रखा। अपने उत्कृष्ट लेखन के लिए इन्हें अपनी रचना ‘कामायनी’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया।
अत्यधिक विषम परिस्थितियों को जीवटता के साथ झेलते हुए यह युग-सष्टा साहित्यकार हिन्दी के मन्दिर में अपूर्व रचना-सुमन अर्पित करता हआ 15 नवम्बर, 1937 को काशी में निष्प्राण हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ

जयशंकर प्रसाद के काव्य में प्रेम और सौन्दर्य प्रमुख विषय रहा है। साथ ही उनका दृष्टिकोण मानवतावादी है। प्रसाद जी सर्वतोन्मुखी प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे। प्रसाद जी ने कुल 67 रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। ये ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ के उपाध्यक्ष भी थे।

कृतियाँ

इनकी प्रमुख काव्य कृतियों में चित्राधार, प्रेमपथिक, कानन-कुसुम, झरना, आँसू, लहर, कामायनी आदि शामिल हैं।
चार प्रबन्धात्मक कविताएँ शेरसिंह का शस्त्र समर्पण, पेशोला की प्रतिध्वनि, प्रलय की छाया तथा अशोक की चिन्ता अत्यन्त चर्चित रहीं। नाटक चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ, राज्यश्री, अजातशत्र, प्रायश्चित आदि।
उपन्यास कंकाल, तितली एवं इरावती (अपूर्ण रचना)
कहानी संग्रह प्रतिध्वनि, छाया, आकाशदीप, आँधी आदि।
निबन्ध संग्रह काव्य और कला

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. सौन्दर्य एवं प्रेम के कवि प्रसाद जी के काव्य में श्रृंगार रस के संयोग एवं विप्रलम्भ, दोनों पक्षों का सफल चित्रण हआ है। इनके नारी सौन्दर्य । के चित्र स्थूलता से मुक्त आन्तरिक सौन्दर्य को प्रतिबिम्बित करते हैं। हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
    एक लम्बी काया उन्मुक्ता”
  2. दार्शनिकता उपनिषदों के दार्शनिक ज्ञान के साथ बौद्ध दर्शन का
    समन्वित रूप भी इनके साहित्य में मिलता है।
  3. रस योजना इनका मन संयोग श्रृंगार के साथ-साथ विप्रलम्भ शृंगार के चित्रण में भी खूब रमा है। इनके वियोग वर्णन में एक अवर्णनीय रिक्तता एवं अवसाद ने उमड़कर सारे परिवेश को आप्लावित कर लिया है। इनके काव्यों में शान्त एवं करुण रस का सुन्दर चित्रण हआ है तथा कहीं-कहीं वीर रस का भी वर्णन मिलता है।
  4. प्रकृति चित्रण इन्होंने प्रकृति के विविध रूपों का अत्यधिक हृदयग्राही चित्रण किया है। इनके यहाँ प्रकृति के रम्य चित्रों के साथ-साथ प्रलय का भीषण चित्र भी मिलता है। इनके काव्यों में प्रकृति के उद्दीपनरूप आदि के चित्र प्रचुर मात्रा में हैं।
  5. मानव की अन्तःप्रकृति का चित्रण इनके काव्य में मानव मनोविज्ञान का विशेष स्थान है। मानवीय मनोवृत्तियों को उन्नत रूप देने वाली उदात्त भावनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। इसी से रहस्यवाद का परिचय मिलता है। ये अपनी रचनाओं में शक्ति-संचय की प्रेरणा देते हैं।
  6. नारी की महत्ता प्रसाद जी ने नारी को दया, माया, ममता, त्याग,
    बलिदान, सेवा, समर्पण आदि से युक्त बताकर उसे साकार श्रद्धा का रूप प्रदान किया है। इन्होंने “नारी! तुम केवल श्रद्धा हो” कहकर नारी को सम्मानित किया है।

कला पक्ष

  1. भाषा प्रसाद जी की प्रारम्भिक रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं, परन्तु शीघ्र ही वे । खड़ीबोली के क्षेत्र में आ गए। उनकी खड़ीबोली उत्तरोत्तर परिष्कृत,

संस्कृतनिष्ठ एवं साहित्यिक सौन्दर्य से युक्त होती गई। उनके द्वारा रचना के क्रम में किए गए अद्वितीय शब्दों के चयन में अर्थ की गम्भीरता परिलक्षित होती है। इन्होंने भावानुकूल चित्रोपम शब्दों का प्रयोग किया। लाक्षणिकता एवं प्रतीकात्मकता से युक्त प्रसाद जी की भाषा में अद्भुत नाद-सौन्दर्य एवं ध्वन्यात्मकता के गण विद्यमान हैं। इन्होंने अपने भाषायी कौशल से चित्रात्मक भाषा में संगीतमय चित्र अंकित किए।

  1. शैली प्रबन्धकाव्य (कामायनी) एवं मुक्तक (लहर, झरना आदि) दोनों रूपों में प्रसाद जी का समान अधिकार था। इनकी काव्य शैली परम्परागत एवं नवीन अभिव्यक्ति का अनुपम समन्वय है। विषयभाव के अनुसार उचित शैलियों जैसे-वर्णनात्मक, भावात्मक, आलंकारिक, सूक्तिपरक, प्रतीकात्मक आदि का प्रयोग इनकी रचनाओं की विशेषता है।।
  2. अलंकार एवं छन्द सादृश्यमूलक अर्थालंकारों में इनकी वृत्ति अधिक रमी है। इन्होंने नवीन उपमानों का प्रयोग करके उन्हें नई भंगिमा प्रदान की। रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति, प्रतीक आदि इनके प्रिय अलंकार हैं इनके साथ मानवीकरण, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विशेषण-विपर्यय जैसे आधुनिक अलंकारों का भी सुन्दर उपयोग किया। विविध छन्दों का प्रयोग तथा नवीन छन्दों की उद्भावना इनकी रचनाओं में द्रष्टव्य है। इनकी आरम्भिक रचनाएँ घनाक्षरी छन्द में हैं। इन्होंने अतुकान्त छन्दों का प्रयोग अधिक किया है। ‘आँसू’ काव्य ‘सखी’ नामक मात्रिक छन्द में लिखा।
    इन्होंने ताटक, पादाकुलक, रूपमाला, सार, रोला आदि छन्दों का भी प्रयोग किया। इन्होंने अंग्रेजी के सॉनेट तथा बांग्ला के त्रिपदी एवं पयार जैसे छन्दों का भी सफल प्रयोग किया। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रसाद जी में भावना, विचार एवं शैली तीनों की प्रौढ़ता मिलती है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

प्रसाद जी भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से हिन्दी के युग-प्रवर्तक कवि के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं। भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प सभी क्षेत्रों में प्रसाद जी ने युगान्तरकारी परिवर्तन किए हैं। डॉ. राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने हिन्दी-साहित्य में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए
लिखा है-“वे छायावादी काव्य के जनक और पोषक होने के साथ ही, आधुनिक काव्यधारा का गौरवमय प्रतिनिधित्व करते हैं।”

पद्यांशों की सन्दर्भ व प्रसंग सहित व्याख्या

गीत

  1. बीती विभावरी जाग री।
    अम्बर-पनघट में डुबो रही-
    तारा-घट ऊषा नागरी।
    खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
    किसलय का अंचल डोल रहा,
    लो यह लतिका भी भर लाई-
    मधु-मुकुल नवल रस-गागरी।
    अधरों में राग अमन्द पिए,
    अलकों में मलयज बन्द किए-
    तू अब तक सोई है आली!
    आँखों में भरे विहाग री।

शब्दार्थ विभावरी-रात; अम्बर-आकाश, पनघट-कुआँ घट-घड़ा;
ऊषा-सवेरा; नागरी-नायिका, महिला; खग-कुल-पक्षियों का समूहः कुल-कुल-पक्षियों का कलरव किसलय-नया पत्ता; अंचल-आँचल; लतिका-लता, बेल; मधु-मकरन्द रस; मुकुल-कली नवल-नया; अधर-होठ; अमन्द-तीव्र, अधिक, अलक-केश, बाल; मलयज- मलय पर्वत से आने वाली सुगन्धित पवन; आली-सखी: विहाग-रात्रि के अन्तिम प्रहर में गाया जाने वाला एक राग

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘गीत’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्रात:कालीन सौन्दर्य के माध्यम से प्रकृति के जागरण का आह्वान किया है।

व्याख्या इस पद्यांश में एक सखी दसरी सखी से कहती है, हे सखी! रात बीत गई है, अब तो तुम जागो। गगनरूपी पनघट में उषारूपी नायिका तारारूपी घड़े को डुबो रही है अर्थात् समस्त नक्षत्र प्रभात के आगमन के कारण आकाश में लीन हो गए हैं। प्रातःकाल के आगमन पर पक्षियों के समूह कलरव कर रहे हैं। शीतल मन्द सुगन्धित हवा चलने से पल्लवों के आँचल हिलने लगे हैं। लताएँ भी नवीन परागरूपी रस से युक्त गागर को भर लाई है।
(समस्त कलियाँ पुष्पों में परिवर्तित होकर पराग से युक्त हो गई हैं); परन्तु हे सखी! तू अपने अधरों में प्रेम की मदिरा को पिए हए, अपने बालों में सुगन्ध को समाए हुए तथा आँखों में आलस्य भरे हुए सो रही है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि प्रातःकाल होने पर सर्वत्र जागरण हो गया है और तू अभी तक सोई

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने प्रातःकालीन सौन्दर्य का अनुपम वर्णन किया है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा शुद्ध संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली शैली गीति
अलंकार सांगरूपक, अनुप्रास, उपमा, मानवीकरण, पुनरुक्तिप्रकाश एवं यमका गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना

श्रद्धा-मनु

  1. ‘कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर
    तरंगों से फेंकी मणि एक;
    कर रहे निर्जन का चुपचाप
    ‘प्रभा की धारा से अभिषेक?
    मधुर विश्रान्त और एकान्त
    जगत् का सुलझा हुआ रहस्य;
    एक करुणामय सुन्दर मौन
    और चंचल मन का आलस्य!

शब्दार्थ संसति-जलनिधि-संसाररूपी सागर, भवसागरतीर-तट,
किनारा; मणि-एक रत्न, निर्जन-सुनसान, शून्य; प्रभा-कान्ति;
अभिषेक-तिलक, स्नान; विश्रान्त-थका हुआ; जगत -संसार।

सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक में संकलित जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।

प्रसंग प्रलय के अनन्तर श्रद्धा-मनु को निर्जन स्थान में मौन बैठे देखकर उसके बारे में पूछती है। वह मनु के बारे में जानने के लिए उत्सुक है।।

व्याख्या श्रद्धा, मनु से प्रश्न करती है कि तुम कौन हो? जिस प्रकार
सागर की लहरें अपनी तरंगों से मणियों को अपने किनारे पर फेंक देती हैं. उसी प्रकार संसाररूपी सागर की लहरों द्वारा इस निर्जन स्थान में फेंके हुए। तम कौन हो? तुम चुपचाप बैठकर इस निर्जन स्थान को अपनी आभा से उसी प्रकार सशोभित कर रहे हो, जैसे सागर तट पर पड़ी हुई मणि उसके निर्जन तट को आलोकित करती है। श्रद्धा कहती है कि हे अपरिचित! तुम मुझे मधरता. नीरवता से परिपूर्ण इस संसार में सुलझे हुए रहस्य की भाँति प्रतीत हो रहे हो। अपरिचित होने के कारण तुम रहस्यमय हो, फिर भी तुम्हारे मुख के।

भाव तुम्हारे रहस्य को सुलझा रहे हैं। तुम्हारा सुन्दर और मौन रूप करुणा से । परिपूर्ण है और तुम्हारे चंचल मन ने आलस्य धारण कर लिया है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) सागर की लहरों द्वारा फेंकी हुई मणि से मनु की तुलना करके प्रसाद जी ने उनके एकाकी जीवन की निराशा और कर्म-विरत स्थिति का भावपूर्ण चित्रण किया है।
(ii) रस संयोग श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द श्रृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार रूपक, उत्प्रेक्षा एवं विरोधाभास गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

2.सुना यह मनु ने मधु गुंजार
मधुकरी का-सा जब सानन्द,
किए मुख नीचा कमल समान
प्रथम कवि का ज्यों सुन्दर छन्द।
एक झटका-सा लगा सहर्ष,
निरखने लगे लुटे-से, कौन
गा रहा यह सुन्दर संगीत?
कुतूहल रह न सका फिर मौन।

शब्दार्थ मधु-मधुर, मीठा; गुंजार -गूंज; मधुकरी-भ्रमरी; सानन्द-आनन्द सहित; प्रथम कवि-आदिकवि, वाल्मीकि; झटका-धक्का, झोंका; सहर्ष-खुशी के साथ; निखरना-सँवरना; कृतहल-जिज्ञासा।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में उस समय का वर्णन है जब प्रलय के उपरान्त मनु की भेंट श्रद्धा से होती है और वह उसके सुमधुर स्वर को सुनकर आश्चर्यचकित रह जाता है।

व्याख्या मनु और श्रद्धा की प्रथम भेंट होने पर जब श्रद्धा उससे उसका परिचय पूछती है तो उसकी आवाज उन्हें भौंरों के मधुर गुंजार के समान आनन्ददायक प्रतीत होती है। अपरिचित मनु का परिचय पूछने के क्रम में श्रद्धा लज्जावश अपना सिर नीचे झुकाए रहती है जिसे देख मनु को ऐसा आभास होता है, जैसे कोई खिला हुआ कमल पृथ्वी की ओर झुका हो। मनु को कमल सदृश
सुन्दर दिखने वाले उसके मुख से निकले मधुर बोल आदि कवि के सुन्दर छन्द-से प्रतीत होते हैं। उस निर्जन स्थान पर जहाँ किसी के होने की कोई सम्भावना न थी, श्रद्धा जैसी अनुपम रूपवती को देखकर मनु आश्चर्यचकित हो उठते हैं और उनका मलिन मुख निखर उठता है। श्रद्धा के कण्ठ से निकले गीत सदृश बोल का उन पर
ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वह उससे बोले बिना नहीं रह पाते और उसके विषय में सब कुछ जान लेना चाहते हैं।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में प्रथम मिलन के दौरान मनु और श्रद्धा का एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होने का भाव दर्शाया गया है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
छन्द शृंगार छन्द अलंकार उपमा, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास
गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा एवं लक्षणा

  • 3 और देखा वह सुन्दर दृश्य
    नयन का इन्द्रजाल अभिराम।
    कुसुम-वैभव में लता समान
    चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।
    हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
    एक लम्बी काया, उन्मुक्त।
    मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल
    सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।
    मसृण गान्धार देश के, नील
    रोम वाले मेषों के चर्म,
    ढक रहे थे उसका वपु कान्त
    बन रहा था वह कोमल वर्म।

शब्दार्थ इन्द्रजाल जादू: अभिराम सुन्दर, अनोखा; कुसुम वैभव पुष्षों का ऐश्वर्य; चन्द्रिका चाँदनी; घनश्याम काला बादल; अनुकति प्रतिकृति, नकल; बाह्य बाहर; काया शरीर; उन्मुक्त स्वतन्त्र, मध पवन वसन्त में बहने वाली सुगन्धित हवा; क्रीडित खेलता हुआ; शिश साल साल का छोटा-सा वृक्ष; सौरभ संयक्त-सुगन्ध से युक्त, मसण-कोमल, चिकना; रोम-रोआँ: मेष-भड़चर्म-चमड़ा; वपु कान्त सुन्दर शरीर; वर्म-कवच।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा की अपूर्व सुन्दरता और आन्तरिक गुणों का उल्लेख किया गया है।

व्याख्या श्रद्धा की समधुर ध्वनियों को सुनने के पश्चात जब मन का ध्यान उसके रूप की ओर गया तब वह दृश्य उनकी आँखों को जादू के समान सुन्दर और मोहक लगा। श्रद्धा फलों से परिपूर्ण लता के समान सुन्दर और शीतल चाँदनी में लिपटे हुए बादल-सी आकर्षक प्रतीत हो रही थी। उसका हृदय उदार और विस्तृत था। वह लम्बे कद की उन्मुक्त युवती थी। लम्बे और सुन्दर दिखने वाले शरीर में वह ऐसे शोभायमान थी मानो वसन्त की बयार अर्थात् वसन्ती हवा में झूमता हुआ साल का कोई छोटा-सा वृक्ष सुगन्ध से सराबोर होकर चारों ओर अपनी शोभा बिखेर रहा हो।
श्रद्धा के वस्त्र गन्धार देश में पाई जाने वाली नीले बालों की भेड़ों की खाल से बने थे। अत्यन्त कोमल होते हए भी वे वस्त्र न केवल उसके सुन्दर तन को ढक रहे थे, बल्कि कवच के समान शरीर की रक्षा भी कर रहे थे। कहने का तात्पर्य है कि श्रद्धा उन वस्त्रों में सुन्दर और सुरक्षित दिख रही थी।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) यहाँ श्रद्धा के आन्तरिक गुणों के साथ-साथ उसके वस्त्रों की विशेषता व्यक्त की गई है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द श्रृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार उपमा. रूपकातिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास
गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा एवं लक्षणा

4.नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-वन बीच गुलाबी रंग।
आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम-
बीच जब घिरते हों घन श्याम;
अरुण रवि मण्डल उनको भेद
दिखाई देता हो छविधाम!

शब्दार्थ नील नीला; परिधान वस्त्र, सुकमार अति कोमल, मृदुल कोमल; मेघ-बन बादलों का समूह; व्योम आकाश; अरुण लाल, रवि सूर्य; छविधाम सौन्दर्य का भण्डार

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश में श्रद्धा के रूप-सौन्दर्य की तुलना प्रकृति के सुन्दर दृश्यों से की गई है।

व्याख्या मनु के भावों की अभिव्यक्ति करते हुए प्रसाद जी लिखते हैं कि श्रद्धा भेड़-चर्म के बने नीले वस्त्र में अत्यन्त आकर्षक दिख रही है। वस्त्रों के मध्य कहीं-कहीं से दिखाई दे रहे उसके कोमल अंग ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, जैसे वे नीले बादलों के समूह में चमकती हुई बिजली के गुलाबी-गुलाबी फूल हों। नीले वस्त्र के मध्य श्रद्धा के लालिमायुक्त तेज मुख को देख ऐसा आभास होता है, मानो साँझ
के समय काले बादलों को भेदकर चारों ओर लाल किरणें बिखेरता सूर्य शोभायमान हो।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पंक्तियों द्वारा कवि श्रद्धा के अपूर्व सुन्दर होने का भाव दर्शा रहा है।
(ii) रस संयोग श्रृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक रस शृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति एवं रूपक
गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा एवं लक्षणा

  • 5 घिर रहे थे धुंघराले बाल
    अंश अवलम्बित मुख के पास;
    नील घन-शावक-से सुकुमार
    सुधा भरने को विधु के पास।
    और उस मुख पर वह मुसक्यान
    रक्त किसलय पर ले विश्राम;
    अरुण की एक किरण अम्लान
    अधिक अलसाई हो अभिराम।

शब्दार्थ अंश कन्धा; अवलम्बित आश्रित; घन-शावक शिशु बादल;
सुधा अमृत; विधु-चन्द्रमा; रक्त किसलय लाल कोपलें; अम्लान उज्ज्वल; अलसाई आलस्य से पूर्ण)

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश में श्रद्धा के सुन्दर मुखड़े और मुसकान की चर्चा की गई है।

व्याख्या श्रद्धा के केश सुन्दर और घुघराले थे। वे उसके चेहरे से होकर कन्धों पर ऐसे झूल रहे थे मानो अमृत पान हेतु नन्हें बादल सागर तल को स्पर्श करने की कोशिश कर रहे हों। उसके सुन्दर मुख पर बिखरी हुई मुसकान को देख ऐसा आभास हो रहा था, जैसे सूर्य की कोई अलसाई-सी उज्ज्वल किरण लाल नवीन कोपल पर विश्राम कर रही हो।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से श्रद्धा के मुखमण्डल को दिव्य-रूप में चित्रित । करने का भाव प्रकट हुआ है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द श्रृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार अनुप्रास, उपमा एवं मानवीकरण गुण माधुर्य शब्द शक्ति लक्षणा

  • 6 कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच
    बना जीवन रहस्य निरुपाय;
    एक उल्का-सा जलता भ्रान्त
    शून्य में फिरता हूँ असहाय।”
    “कौन हो तुम वसन्त के दूत
    बिरस पतझड़ में अति सुकुमार;
    घन तिमिर में चपला की रेख
    तपन में शीतल मन्द बयार!”

शब्दार्थ नभ-आकाश; धरणी-धरती, पृथ्वी; निरुपाय-बिना उपाय के; उल्का-टूटा हुआ तारा; भ्रान्त-भटकने वाला; शून्य-निर्जन स्थान, आकाश; दूत-सन्देशवाहक; बिरस-नीरस, उजाड़; घन-बादल; तिमिर-अन्धकार: चपला-बिजली; तपन-ताप; मन्द-धीमी, मधुर; बयार-वायु।।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग श्रद्धा के पूछने पर उसे अपना परिचय बताते हुए मनु अपनी दयनीय दशा का वर्णन करते हैं।

व्याख्या श्रद्धा की जिज्ञासा को शान्त करने के उददेश्य से मनु अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि इस पृथ्वी और आकाश के मध्य भटकता हुआ मेरा जीवन रहस्य बन गया है, किन्तु मैं इसी स्थिति में जीने के लिए विवश हूँ। मुझे इससे उबरने का कोई मार्ग नहीं सूझता। जिस प्रकार एक उल्का शून्य में यूँ ही भटकता फिरता है, उसी प्रकार मैं भी इस धरती पर तरह-तरह की मुसीबतों को
झेलता हुआ असहाय और अकेला भटक रहा हूँ। तत्पश्चात् मनु श्रद्धा से पूछते हैं कि इतनी सुकुमार दिखने वाली तुम कौन
हो? जिस प्रकार पतझड़ के बाद वसन्त के आगमन से चारों ओर हरियाली छाने लगती है, उसी प्रकार मेरे नीरस एवं समस्याओं से ग्रस्त इस जीवन में तुम्हारे आगमन से नई आशाओं का संचार हुआ है। तुम काले बादलों के मध्य घनघोर अन्धकार में बिजली की चमक बनकर आई हो और प्रचण्ड गर्मी में शीतलता प्रदान करने वाली धीमी-धीमी बहने वाली हवा की तरह सुखदायक हो अर्थात् तुम दुःख एवं सन्ताप से भरे मेरे इस गतिहीन और सूने जीवन में नव-चेतना भरने वाली हो।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत काव्यांश में कवि ने मनु के जीवन की उदासी और अकेलेपन को साकार करने की चेष्टा की है। साथ-ही-साथ श्रद्धा के आगमन के पश्चात मन के जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलाव का संकेत भी दिया है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार श्लेष, उपमा, रूपकातिशयोक्ति एवं रूपक शब्द शक्ति लक्षणा गुण माधुर्य

  • 7 लगा कहने आगन्तुक व्यक्ति
    मिटाता उत्कण्ठा सविशेष,
    दे रहा हो कोकिल सानन्द
    सुमन को ज्यों मधुमय सन्देश-
    भरा था मन में नव उत्साह
    सीख लूँ ललित कला का ज्ञान;
    इधर रह गन्धर्वो के देश
    पिता की हूँ प्यारी सन्तान।

शब्दार्थ आगन्तुक-आया हुआ; उत्कण्ठा-उत्सुकता; सविशेष-तीव्र, प्रबल; कोकिल-कोयल; सुमन-पुष्प; मधुमय-मधुर; ललित कला-चित्रकारी, पेन्टिंग, संगीत आदि कलाएँ; गन्धर्व-संगीत में पारंगत एक देव जाति।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से मनु के पूछने पर श्रद्धा उन्हें अपने बारे में जानकारी देती है।

व्याख्या श्रद्धा को देख मनु के मन में यह जानने की तीव्र आकांक्षा होती है। कि आखिर वह है कौन? मनु की आकांक्षा को शान्त करती हई श्रद्धा नाम की वह आगन्तुक मीठी वाणी में अपना परिचय देती है। उस समय अमृत रस टपकाती हुई उसकी आवाज ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे कोयल अति प्रसन्नता। के साथ अपनी सुमधुर ध्वनि में पुष्पों को ऋतुराज अर्थात् वसन्त के आगमन का सन्देश सुना रही हो। श्रद्धा मनु से कहती है कि मैं अपने पिता की अत्यन्त प्रिय सन्तान हूँ। मेरा। मन नवीन उत्साह से परिपूर्ण था। मेरी प्रबल इच्छा थी कि मैं ललित कलाएँ। सीखू। इसी उद्देश्य से इन दिनों मैं गन्धर्व देश में निवास कर रही हूँ।।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत काव्यांश के माध्यम से श्रद्धा के विषय में यह पता चलता है कि वह अपने पिता की प्यारी सन्तान है और संगीत शास्त्र से जुड़ी हुई है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार रूपक, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा

  • 8 दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर
    प्रश्न करता मन अधिक अधीर;
    धरा की यह सिकुड़न भयभीत
    आह कैसी है? क्या है पीर?
    बढ़ा मन और चले ये पैर
    शैल मालाओं का श्रृंगार;
    आँख की भूख मिटी यह देख
    आह कितना सुन्दर सम्भार।

शब्दार्थ हिम-गिरि-हिमालय, अधीर-धैर्यहीन धरा-धरती पीर-पीड़ा: शैल। माला-पर्वत श्रृंखला; सम्भार-सम्पत्ति, सम्पूर्णता।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग अपना परिचय देकर श्रद्धा मनु को यह बताती है कि वह किस प्रकार उस स्थान पर पहुंची।

व्याख्या श्रद्धा कहती है कि मेरी दृष्टि जब हिमालय की ओर जाती है, तब मेरे मन में न जाने कितने ही तरह के प्रश्न उठने लगते हैं और मैं उनके । उत्तर जानने के लिए बेचैन हो उठती हूँ। इतने विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई धरती की सिकुड़न के रूप में इस पर्वत श्रृंखला का वास्तविक स्वरूप क्या है? इसकी। आह कैसी है? इसकी पीड़ा कितनी गहरी है? अर्थात् इन दुर्गम स्थलों पर रहने वाले लोगों का जीवन कितना कष्टप्रद और चुनौतियों से भरा है। ऐसे । कितने ही प्रश्न मेरे मन को व्याकुल कर देते हैं। श्रद्धा अपनी बात को आगे बढ़ाती हई कहती है कि इन प्रश्नों का कोई समाधान न मिलने पर मेरा मन हिमालय के दर्शन को व्याकुल हो उठा और मेरे कदम उस ओर चल पड़े। हिमाच्छादित गगनचुम्बी पर्वत-चोटियों और चारों
ओर फैले ऊँचे-ऊँचे हरे-भरे वृक्षों के समूहों को देखकर मेरी आँखों की भूख शान्त हो गई। सचमुच सौन्दर्य सम्पन्नता का कितना अद्भुत दृश्य है यह पर्वत । श्रृंखला।

कला सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में हिमालय की सुन्दरता का अत्यन्त सजीव चित्रण किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार रूपक, अनुप्रास एवं मानवीकरण गुण प्रसाद
शब्द शक्ति अभिधा एवं लक्षणा

  • 9 यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न
    भूत-हित-रत किसका यह दान!
    इधर कोई है अभी सजीव,
    हुआ ऐसा मन में अनुमान।
    तपस्वी! क्यों इतने हो क्लान्त,
    वेदना का यह कैसा वेग?
    आह! तुम कितने अधिक हताश
    बताओ यह कैसा उद्वेग?

शब्दार्थ बलि का अन्न-वह अन्न जो जीवों के कल्याणार्थ गृहस्थों द्वारा प्रतिदिन घर से बाहर रख दिया जाता है। भूत-हित-रत-जीवों की भलाई में लीन; क्लान्त-थका हुआ, दुःखी; वेदना-दर्द, वेग-तीव्रता; हताश-निराश; | उद्वेग- घबराहट, चिन्ता।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से श्रद्धा-मनु को वहाँ तक पहुँचने का कारण बताते हुए उन्हें उदास न रहने की प्रेरणा भी देना चाहती है।

व्याख्या श्रद्धा मन से कहती है कि विराट हिमालय के दर्शन करने के दौरान इस स्थान पर पहुँचने पर जब मेरी दृष्टि सभी जीव-जन्तुओं के भरण-पोषण हेत प्रतिदिन अपने भोजन में से गृहस्थों द्वारा निकाले गए अन्न के हिस्से पर पड़ी तो मैंने सोचा कि यहाँ पर निश्चय ही कोई व्यक्ति निवास कर रहा है, अन्यथा इस वीरान क्षेत्र में दान का अन्न कहाँ से आता। मुझे इस विश्वास ने ही तम तक पहुँचा दिया कि इस निर्जन क्षेत्र में कोई जीवित व्यक्ति। अवश्य विद्यमान है। तत्पश्चात् श्रद्धा मनु से पूछती है कि किन्तु, हे तपस्वी! आखिर किस कारण से तुम इतने दुःखी और उदास हो? तुम्हारे मन में इतनी तीव्र पीड़ा क्यों है? तुम्हारे निराश होने के पीछे क्या कारण हैं? यह कैसी चिन्ता है जो तुम्हारे मन-मस्तिष्क में लगातार विराजमान है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा स्वयं के वहाँ पहुँचने के विषय में बताकर मनु के प्रति सहानुभूति व्यक्त करती हुई उनके दुःख का कारण जानना चाहती है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार अनुप्रास एवं प्रश्न गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा

  • 10 “दुःख की पिछली रजनी बीत
    विकसता सुख का नवल प्रभात;
    एक परदा यह झीना नील
    छिपाए है जिसमें सुख गात।
    जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
    जगत् की ज्वालाओं का मूल;
    ईश का वह रहस्य वरदान
    कभी मत इसको जाओ भूला”

शब्दार्थ रजनी-रात; विकसता-निकलता; नवल प्रभात-नया सवेरा; झीना- पतला; अभिशाप-शाप, अशुभ का कारण; जगत-संसार; ज्वाला-आग, समस्याः । मूल-आधार; ईश-ईश्वर; रहस्य वरदान-अनसुलझा हुआ वरदान।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से श्रद्धा मनु को उदासी त्यागकर प्रसन्नचित और आशान्वित होकर जीने की प्रेरणा दे रही है।

व्याख्या श्रद्धा-मनु को प्रेरित करते हुए कहती है कि दुःख की रात के ही मध्य सुख का नया सेवरा उदित होता है। जिस प्रकार प्रभात का प्रकाश अन्धकार के महीन परदे में छिपा रहता है, उसी प्रकार सुख भी दु:ख के महीन आवरण में छिपा रहता है कहने का तात्पर्य यह है कि दुःख का यह प्रभाव अधिक देर तक नहीं टिकता और नई आशाओं को सँजोए हुए सुख का आगमन होकर रहता है।
श्रद्धा आगे कहती है कि जिस दुःख से परेशान होकर तुमने उसे अभिशाप मान लिया है और उसे ही सभी समस्याओं का कारण समझ बैठे हो, वास्तव में वह दुःख ईश्वर से हमें वरदान सदृश प्राप्त हुआ है, किन्तु इस रहस्य को समझ पाना आसान नहीं। बावजूद इसके तुम्हें इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि दुःखरूपी वरदान ही मानव को सुख प्राप्त करने के लिए सदा प्रेरित करता
रहता है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में दुःख में ही सुख के छुपे होने का भाव प्रकट किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली
शैली प्रबन्धात्मक
छन्द शृंगार (16 मात्राओं का छन्द) अलंकार रूपक, उपमा एवं अनुप्रास गुण प्रसाद
शब्द शक्ति लक्षणा
भाव साम्य निम्नलिखित पंक्तियों में उक्त पद्यांश के भाव से मिलते-जुलते भाव। प्रकट हुए हैं-

“वेदना विकराल धारण रूप करती जब प्रसव की
तब नया इतिहास गढ़ने जन्म लेता एक बालक
दंश कितने झेलता जब बिजलियों का आसमाँ

ओट से तब बादलों की बूंद गिरती है धरा पर
तोड़कर दीवारें कितनी फूटता है एक अकुंर।
तब धरा पर हो खड़ा है मुस्कराता छू गगन।”

11.लगे कहने मनु सहित विषाद-
“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास;
अधिक उत्साह तरंग अबाध
उठाते मानस में सविलास।
किन्तु जीवन कितना निरुपाय!
लिया है देख नहीं सन्देह;
निराशा है जिसका परिणाम
सफलता का वह कल्पित गेह।”

शब्दार्थ विषाद-दुःखः मधर मारुत आनन्ददायक पवन; उच्छवास सॉस के रूप में वायु का आना-जाना; अबाध-बाधारहित; मानस हृदय; सविलास-क्रीड़ा सहित, कल्पित गेह-कल्पना का घर।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में मनु श्रद्धा के प्रेरणाजन्य कथनों पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।

व्याख्या श्रद्धा की बातों को सुनकर मनु दुःख भरे शब्दों में कहते हैं कि शीतल मन्द पवन की तरह सुखद प्रतीत होने वाले तुम्हारे ये उच्छवास निश्चय ही आनन्द प्रदान करने वाले और मन को सौन्दर्य की अनुभूति से परिपूर्ण कर देने वाले हैं। इनके परिणाम स्वरूप मन में निरन्तर ही उत्साह की तरंगें हिलोरे ले रही हैं, किन्तु इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि मनुष्य का जीवन विषाद
से परिपूर्ण है और वह उसके सम्मुख विवश और असहाय है। हम जीवन में अनेक सफलताओं की कामना करते हैं, लेकिन सच्चाई तो यह है कि हमें उन सबका परिणाम एकमात्र निराशा के रूप में ही प्राप्त होता है। इस छोटे-से जीवन में हम अपनी विभिन्न चाहों की पूर्ति कभी नहीं कर पाते और एक दिन हमें इस संसार
को छोड़कर जाना पड़ता है। अतः कहा जा सकता है कि हमारा जीवन सफलता की कल्पनाओं का घर है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने जीवन के निराशाजनक तथ्यों को उद्घाटित किया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
छन्द श्रृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार उपमा एवं अनुप्रास
गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा एवं व्यंजना

12.कहा आगन्तुक ने सस्नेह-
“अरे, तुम इतने हुए अधीर;
हार बैठे जीवन का दाँव ।
जीतते मर कर जिसको वीर।
तप नहीं केवल जीवन सत्य
करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;
तरल आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आह्लाद।

शब्दार्थ सस्नेह-प्रेम सहित; दाँव हारना असफल होना; मर कर
जीतना-श्रम से सफलता पाना; क्षणिक क्षण भर का; दीन अवसाद-दीनता से । परिपूर्ण दुःख, तरल आकांक्षा प्रगति की चाह; आह्वाद-प्रसन्नता, खुशी।।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा निराशा में डूबे हुए मनु के मन में आशा,
उत्साह और हर्ष का संचार करने का प्रयत्न करती है।

व्याख्या मनु की बात सुनकर आगन्तुक श्रद्धा कहती है कि हे तपस्वी! तुमने धैर्य खो दिया है। अब तुममें उस सफलता को पाने की तीव्र उत्कण्ठा भी शेष नहीं; जिसे वीर पुरुष अथक परिश्रम के बल पर प्राप्त करते हैं, क्योंकि साहसी और कर्मवीर बनने की जगह तुम निराश और हतोत्साहित हो गए हो। हे तपस्वी! केवल तपस्या को जीवन का ध्येय बनाना कदापि उचित नहीं, क्योंकि बस यही एक जीवन का सत्य नहीं है। तुम जिस करुणा और दीनतापूर्ण
दुःख की स्थिति में जी रहे हो वह अविलम्ब ही समाप्त होने वाली है। वास्तव में मानव-जीवन आशा, उत्साह और खुशियों से परिपूर्ण है। बस आवश्यकता है। उन्हें जगाने की। अतः हमें पूरे उत्साह के साथ आशान्वित होकर जीना चाहिए। निराशा का दामन हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) श्रद्धा अपने तर्कपूर्ण कथनों के माध्यम से मनु की निराशावादी सोच को आशावादी सोच में बदलने का प्रयास कर रही है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार मानवीकरण एवं अनुप्रास गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

13.प्रकृति के यौवन का श्रृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल;
मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र
आह उत्सुक है उनको धूल।

शब्दार्थ बासी जो ताजा न हो; उत्सुक लालायित, जानने के लिए इच्छुका

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से श्रद्धा ने बासी फूल का उदाहरण देकर मनु के निराश मन में उत्साह भरने का प्रयास किया है।

व्याख्या श्रद्धा निराश मनु को समझाते हुए कहती है कि प्रकृति की शोभा कभी भी बासी अथवा मुरझाए हुए फूल नहीं बढ़ाते, जो फूल ताजे हों और खिले हुए हों उन्हीं की सुन्दरता और खुशबू से उद्यान अथवा वन सुशोभित होते हैं। डाल से टूटे हुए फूलों का तो बस एक ही परिणाम होता है और वह है-धूल में मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त कर लेना। अत: मानव को भी निराशा और अकर्मण्यता त्याग कर आशा और उद्यम के सहारे अपने जीवन को सार्थक
बनाना चाहिए।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) यहाँ श्रद्धा के द्वारा मनु के अन्तर्मन को परिवर्तित करने का प्रयास किया जा रहा है। वह मनु के निराश मन को आशाओं और उत्साह से भर देना। चाहती है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
पट भंगार (16 मात्राओं का छन्द) अलंकार मानवीकरण एवं रूपक
गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

  • 14 एक तुम, यह विस्तृत भू-खण्ड
    प्रकृति वैभव से भरा अमन्द;
    कर्म का भोग, भोग का कर्म
    यही जड़ का चेतन आनन्द।
    अकेले तुम कैसे असहाय
    यजन कर सकते? तुच्छ विचार;
    तपस्वी! आकर्षण से हीन
    कर सके नहीं आत्म विस्तार।

शब्दार्थ विस्तृत-विशाल, बड़ा; भू-खण्ड-धरती का टुकड़ा; वैभव-सौन्दर्य, सम्पदा; अमन्द-प्रयत्नशील, प्रकाशवान; जड-स्थित, अगतिशील, धराः | चेतन- सजीवता; असहाय-निराश्रित; यजन-यज्ञ; वच्छ-अधम, निम्न आत्म विस्तार-अपनी उन्नति।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा-मनु को कर्मयोगी बनने के लिए प्रेरित कर रही है।

व्याख्या श्रद्धा निराशा से भरे मनु के मन में आशा के दीप जलाना चाहती है। वह कहती है कि एक ओर तुम हो कि बस निराशा और असफलता की ही बातें करते रहते हो और दूसरी ओर प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण यह विस्तृत भ-भाग है, जो हमें नित आशाओं और उत्साह से भरकर कर्मवीर बनने का सन्देश देता रहता है। तुम्हें इस प्रकार निराश और उद्यमहीन होकर जीवन नहीं । बिताना चाहिए, बल्कि कठिन परिश्रम करते हुए इस पथ्वी पर स्थित संसाधनों का उचित रूप से उपभोग करना चाहिए। हमें अपने कर्म के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है। हम इस जन्म में किए गए अच्छे या बुरे कर्मों के आधार पर ही अगले जन्म में सुख या दुःख का भोग करते हैं। हमें निष्काम कर्मयोग’ अर्थात फल पाने की चिन्ता को त्यागकर कर्म में रत रहने के सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए जीवन जीना चाहिए। हमारी प्रकृति में भी इसी सिद्धान्त का पालन किया जाता है। पेड-पौधे, जिन्हें जड माना गया है, निःस्वार्थ भाव से फूलते-फलते हैं। यह जड़ प्रकृति का चेतन आनन्द है। अतः हमें प्रकृति से सीख लेकर अपने जीवन को कर्म में लगाए रखना चाहिए।
तत्पश्चात् श्रद्धा मनु के कहे पूर्व कथन को दोहराते हुए कहती है कि तुम्हारा कहना है कि मैं अकेला और असहाय हूँ, किन्तु तुम्हीं सोचो; क्या ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया यज्ञ कभी सफल हो सकता है जो अकेला और उत्साहहीन हो! क्या तुम्हारे द्वारा अकेले यज्ञ करने से तुम्हारे तुच्छ विचार पुष्ट नहीं होते। यज्ञ करने के दौरान पत्नी का साथ होना यज्ञ की सफलता हेतु आवश्यक है। तुम्हारे
द्वारा स्वयं को विवश और निराश्रित मानना भी तुम्हारे हीन विचारों का ही प्रतिफल है। सच तो यह है कि दीन-हीन विचारों से आत्म-विस्तार करना कदापि सम्भव नहीं। अतः हे तपस्वी! तुम्हें जीवन से विरत रहकर जीने की इच्छा त्याग देनी चाहिए और जग के कल्याणार्थ कर्मवीर बनकर जीने का संकल्प लेना
चाहिए।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) यहाँ श्रद्धा के माध्यम से स्वार्थपूर्ण जीवन को त्यागकर जन हितार्थ कर्मवीर बनने का भाव व्यक्त किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ी गेली गुण प्रसाद
शैली प्रबन्धात्मक छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार अनुप्रास शब्द शक्ति लक्षणा
भाव साम्य निम्नलिखित पंक्तियों में प्रस्तुत पद्यांश के समान ही भाव साम्यता दशाई गई है

“कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करई सो तस फल चाखा।”
“योग्य जन ही जीता है, पश्चिम की उक्ति नहीं, गीता है गीता है,
स्मरण करो बार-बार, जागो फिर एक बार।”

  • 15 समर्पण लो सेवा का सार
    सजल संसृति का यह पतवार;
    आज से यह जीवन उत्सर्ग |
    इसी पद तल में विगत विकार।
    बनो संसृति के मूल रहस्य
    तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;
    विश्व भर सौरभ से भर जाए
    सुमन के खेलो सुन्दर खेल।

शब्दार्थ सार-मूल तत्त्व, निचोड़; सजल संसति-जलयुक्त सृष्टि; पतवार- नाव खेने का डण्डा; उत्सर्ग-न्योछावर;पद तल में-चरणों में विगत-विकार- पिछले दोष; बेल-लता; सौरभ-सुगन्ध; सुमन-पुष्पा

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा-मनु के समक्ष आत्मसमर्पण करती है, ताकि दोनों मिलकर सम्पूर्ण मानवता की सेवा कर सकें।

व्याख्या श्रद्धा मानवता के हितार्थ स्वयं को मनु को सौंप देना चाहती है। वह मनु से कहती है कि मैं तुम्हारी सेवा करना चाहती हूँ, इसलिए तुम मुझे स्वीकार कर लो। तुम्हारे द्वारा मेरा समर्पण स्वीकार कर लेने से हम इस सृष्टि अर्थात् सम्पूर्ण मानव जाति की भी सेवा कर सकेंगे। इस प्रकार, मेरा सेवा-कर्म इस जलमग्न अर्थात् समस्याओं से ग्रस्त संसार हेतु पतवार बनकर लोक कल्याण में सहायक होगा। तुम्हारे पिछले सभी दोषों को भूलकर मैं आज से अपना जीवन तुम्हें सौंप रही हूँ। जग कल्याणार्थ मुझे अपनी जीवनसंगिनी स्वीकार कर लो। मैं जीवन भर तुम्हारा साथ देकर अपने कर्तव्यों का पूर्णतः
निर्वाह करूँगी। श्रद्धा आगे कहती है कि हे तपस्वी! मुझे अपनाकर सृष्टि को आगे बढ़ाने में सहायक बनो और इसके रहस्यों अर्थात् जीवन-मरण के सच का साक्षात्कार करो। इस सृष्टि को तुम्हारी नितान्त आवश्यकता है। तुम्हारे द्वारा ही सृष्टि की बेल जीवन पा सकेगी। अतः मुझे अपनी संगिनी अर्थात् पत्नी के रूप में सहर्ष स्वीकार कर संसार रूपी बेल को सूखने से बचा लो। तुम्हारे ऐसा करने अर्थात् सृष्टि के सुन्दर खेलों को खेलने से सम्पूर्ण विश्व मानव रूपी सुगन्धित पुष्पों से सुवासित हो उठेगा और प्रकृति खुश होकर झूमने लगेगी।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में मनु के विगत दोषों को भूलकर श्रद्धा द्वारा उसके प्रति पूर्ण समर्पण का भाव प्रस्तुत किया गया है। साथ ही श्रद्धा के द्वारा सृष्टि को आगे बढ़ाने की बातें करने से उसका मानवतावादी दृष्टिकोण भी स्पष्ट होता है।
(ii) रस संयोग शृंगार

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार अनुप्रास एवं यमक
गुण माधुर्य शब्द शक्ति अभिधा

  • 16 और यह क्या तुम सुनते नहीं
    विधाता का मंगल वरदान-
    ‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो’
    विश्व में गूंज रहा, जय गान।
    डरो मत अरे अमृत सन्तान
    अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;
    पूर्ण आकर्षण जीवन केन्द्र
    खिची आवेगी सकल समृद्धि!

शब्दार्थ विधाता-ईश्वर, भाग्य निर्माता; मंगल वरदान-शुभाशीर्वाद; अमृत सन्तान-अमर पुत्र, देव-पुत्र; अग्रसर-आगे की ओर गतिशील; मंगलमय वृद्धि-कल्याणमयी उन्नति; सकल-सम्पूर्ण; समृद्धि-वैभव, खुशहाली।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में मनु के एकान्त एवं निराश जीवन में आशा का संचार करती श्रद्धा उसे नवीन मानव-सृष्टि का प्रवर्तक बनने की प्रेरणा देती है।

व्याख्या श्रद्धा मनु से कहती है कि तुमने इस संसार की रचना करने वाले विधाता का कल्याणकारी वरदान नहीं सुना, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘शक्तिशाली बनकर विजय प्राप्त करो। श्रद्धा कहती है कि हे देवपुत्र मन। तम इस नवीन सष्टि का विकास करने के लिए तैयार हो जाओ। किसी भी पकार की आशंका से भयभीत न हो, क्योंकि कल्याणकारी उन्नति तुम्हारे सम्मुख है। तुम्हारा जीवन आकर्षण से भरा हुआ है। अतः सभी सुख-सम्पन्नता और वैभव । स्वयं ही तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हो जाएगा।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने श्रद्धा के माध्यम से मनु में वीरता और विजयी होने के भावों को जगाने का प्रयास किया है। श्रद्धा द्वारा मनु को सृष्टि के । क्रम को आगे बढ़ाने का सन्देश दिया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार अनुप्रास
गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा

  • 17 विधाता की कल्याणी सृष्टि
    सफल हो इस भूतल पर पूर्णः ।
    पटें सागर, बिखरें ग्रह-पुंज
    और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।
    उन्हें चिनगारी सदृश सदर्प
    कुचलती रहे खड़ी सानन्द;
    आज से मानवता की कीर्ति
    अनिल, भू, जल में रहे न बन्द।

शब्दार्थ भतल-धरातल पटे-भरे ग्रह-पुंज-ग्रहों का समय
चिनगारी-अग्नि कण, स्फुलिग; सदर्प-गर्व साहत, कीर्ति-यश; अनिल-वाया

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग स्वयं को मनु को सौंप देने का प्रस्ताव रख श्रद्धा मनु को विश्वास दिलाती है कि हम दोनों के प्रयास से सम्पूर्ण जगत् में अर्थात् सभी दिशाओं में । मानवता की कीर्ति फैल जाएगी।

व्याख्या सृष्टि की रचना में सहायक बनने के लिए मनु को प्रेरित करते हुए श्रद्धा कहती है कि मानव-सृष्टि संसार के समस्त जीव-जन्तुओं एवं प्रकृति के लिए कल्याणकारी है। तुम अपने मानवोचित कर्तव्यों का निर्वहन कर ईश्वर द्वारा रचित इस सृष्टि के क्रम को चलाने में अपना योगदान दो, ताकि वंश-वृद्धि के द्वारा पृथ्वी
अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सके। तुम्हारे योगदान से अर्थात् सृष्टि-क्रम को आगे बढ़ाने से मानव-शक्ति के द्वारा सारे उफनते समुद्रों पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया जाएगा। सारे ग्रह-नक्षत्र चारों
ओर फैलकर सृष्टि को आलोकित करते हुए मानव-शक्ति का गुणगान करेंगे। उसके समक्ष विध्वंसकारी ज्वालामुखियों की भी एक न चलेगी और उन्हें भी शान्त कर दिया जाएगा अर्थात् मानव समस्त प्राकृतिक आपदाओं पर विजय पाकर उनसे होने वाली हानियों से समस्त जीवों की रक्षा करेगा। आज से वायु, पृथ्वी एवं जल जैसे प्राकृतिक तत्त्व भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैलने वाले मानवता के यश को अवरुद्ध नहीं कर पाएँगे।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) यहाँ श्रद्धा द्वारा मनु को प्रेरित किए जाने के क्रम में मानवीय शक्तियों के अनन्त विस्तार का भाव प्रकट किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार उपमा एवं अनुप्रास
गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा एवं व्यंजना ।
भाव साम्य निम्नलिखित पंक्तियों में उपरोक्त पद्यांश के समान ही भावों का
अभिव्यक्ति की गई है-
“हैं बँधे नर के करों में वारि, विद्युत, भाप,
हुक्म पर चढ़ता-उतरता है पवन का ताप।” — दिनकर।

  • 18 जलधि के फूटें कितने उत्स
    द्वीप, कच्छप डूबे-उतराय;
    किन्तु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति
    अभ्युदय का कर रही उपाय।

शब्दार्थ जलधि-समुद्र; उत्स-स्रोत; कच्छप-कछुआ; अभ्युदय- उत्थान, उन्नति।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा मनु को कर्मवीर होकर जीने की सीख देती हुई कहती है कि मानवता विकास के नित नए मार्गों को ढूँढते रहती है।

व्याख्या प्रलय अर्थात् पृथ्वी के जलमग्न होने की बातों का उल्लेख करते हुए श्रद्धा मन को समझाती है कि भीषण प्रलय में समुद्र के बहुत से स्रोत फूट गए थे और चारों ओर जल-ही-जल हो जाने की स्थिति में द्वीपों सहित कछआ आदि समस्त जीव-जन्तु उसमें डूबने और बहने लगे थे इसके बावजूद मानवता की रक्षा और उत्थान हेतु नव प्रयास जारी हैं। मानवता की दृढ़ मूर्ति के रूप स्वयं हम दोनों यहाँ एक साथ विद्यमान हैं। यहाँ श्रद्धा की बातों का आशय यह है कि महाप्रलय के बाद भी मानवता अपने अस्तित्व की रक्षा करने में विजयी रही है। अतः मनु का। स्वयं को निरुपाय न मानकर समस्या के समाधान पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(i) प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा द्वारा मानवता के असहाय एवं निरुपाय होने का खण्डन किया गया है।
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक
छन्द शृंगार छन्द (16 मात्राओं वाला) अलंकार अनुप्रास
गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा

  • 19 शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त
    विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
    समन्वय उसका करे समस्त
    विजयिनी मानवता हो जाय।

शब्दार्थ विद्युत्कण बिजली के कण; विकल-अस्थिर, बेचैन, निरुपाय-बिना उपाय के समन्वय-मिलन, एकत्र करना; विजयिनी-जीत प्राप्त करने वाली।

सन्दर्भ पूर्ववत्।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा ने मनु को मानवता की विजय का उपाय | बताया है।

व्याख्या श्रद्धा कहती है कि इस सृष्टि की रचना शक्तिशाली विद्युतकणों से । हुई है, किन्तु जब तक विद्युतकण अलग-अलग होकर भटकते हैं, तब तक ये शक्तिहीन होते हैं और जब ये परस्पर मिल जाते हैं, तब इनमें अपार शक्ति का स्रोत प्रस्फुटित होता है।
ठीक उसी प्रकार जब तक मानव अपनी शक्ति को संचित न करके उसे बिखेरता रहता है, तब तक वह शक्तिहीन बना रहता है और जब वह समन्वित हो जाता है, तो वह विश्व को जीत लेने की अपार शक्ति प्राप्त कर लेता है।

काव्य सौन्दर्य
भाव पक्ष
(6) यहाँ विश्व कल्याणार्थ समन्वय अर्थात् एकता की भावना पर जोर दिया गया
(ii) रस शान्त

कला पक्ष
भाषा खड़ीबोली शैली प्रबन्धात्मक छन्द श्रृंगार छन्द (16 मात्राओं का) अलंकार दृष्टान्त गुण प्रसाद शब्द शक्ति लक्षणा

पद्यांशों पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न उत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

गीत

बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट ऊषा-नागरी।
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई-
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी।
अधरों में राग अमन्द पिए,
अलकों में मलयज बन्द किए-
तू अब तक सोई है आली!
आँखों में भरे विहाग री।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के कवि व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित गीत ‘बीती विभावरी जागरी’ से उद्धृत किया गया है।

(ii) ‘अम्बर-पनघट में डूबो रही, तारा-घट ऊषा-नागरी। इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से नायिका की सखी उसे सबह होने के विषय में। बताते हुए कहती है कि ऊषा रूपी नायिका आकाश रूपी पनघट में तारा रूपी घड़े को डुबो रही है अर्थात् रात्रि का समय समाप्त हो गया है और सुबह हो गई है, लेकिन वह अभी तक सोई हुई है।

(iii) प्रभात का वर्णन करने के लिए कवि ने किन-किन उपादानों का प्रयोग किया है?
उत्तर प्रभात का वर्णन करने के लिए कवि ने आकाश में तारों के छिपने, सुबह-सुबह पक्षियों के चहचहाने, पेड़-पौधों पर उगे नए पत्तों के हिलने, समस्त कलियों के पुष्पों में परिवर्तित होकर पराग से युक्त होने आदि उपादानों का प्रयोग किया

(iv) प्रस्तुत पद्यांश के कथ्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में सुबह होने के पश्चात् भी नायिका के सोने के कारण उसकी सखी उसे जगाने के लिए आकाश में तारों के छिपने, पक्षियों के चहचहाने आदि घटनाओं का वर्णन करते हुए उसे जगाने का प्रयास करती है। वह उसे बताना चाहता है कि सर्वत्र प्रकाश होने के कारण सभी अपने कार्यों में संलग्न हो गए हैं, किन्तु वह अभी भी सोई हुई है।

(v) प्रस्तुत गद्यांश में मानवीकरण अलंकार की योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर मानवीकरण अलंकार में प्राकृतिक उपादानों के क्रियाकलापों का वर्णन मानवीय . क्रियाकलापों के रूप में किया जाता है।
प्रस्तुत पद्यांश में सुबह की नायिका के रूप में वर्णन, पत्तों का आँचल डोलना. लताओं का गागर भरकर लाना आदि पद्यांश में मानवीकरण अलंकार के प्रयोग पर प्रकाश डालते हैं।

श्रद्धा-मनु

  1. ‘कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर
    तरंगों से फेंकी मणि एक
    कर रहे निर्जन का चुपचाप
    प्रभा की धारा से अभिषेक?
    मधुर विश्रान्त और एकान्त
    जगत् का सुलझा हुआ रहस्य;
    एक करुणामय सुन्दर मौन
    और चंचल मन का आलस्य!
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) पद्यांश के कवि व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश की रचना जयशंकर प्रसाद ने की है, जिसका शीर्षक । ‘श्रद्धा-मनु’ है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में ‘संसृति-जलनिधि किसे व क्यों कहा गया है?
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में ‘संसृति-जलनिधि’ अर्थात् संसार रूपी सागर से निकली हुई अमूल्य निधि मनु को कहा गया है, क्योंकि जिस तरह सागर की तरंगें अपने भीतर की अमूल्य मणियों व मोतियों को किनारे पर लाकर छोड़ देती हैं, उसी प्रकार जल-प्लावन की घटना ने मनु को इस संसार में छोड़ दिया है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में किसके मन की व्याकुलता को उजागर किया गया है?
उत्तर जल-प्लावन की घटना के पश्चात् सम्पूर्ण संसार में नीरवता छा गई थी. लेकिन उसके पश्चात् भी इस निर्जन संसार में मनु के रूप में मनुष्य को देखकर श्रद्धा के मन में उसके विषय में जानने की व्याकुलता थी। श्रद्धा के मन की इसी व्याकुलता को कवि ने काव्यांश में उजागर किया है।

(iv) मनु को देखने के पश्चात् श्रद्धा को कैसी अनुभूति होती है?
उत्तर मनु को देखने के पश्चात् श्रद्धा को वह समुद्र से निकली हुई मणियों की भाँति प्रतीत होता है, जो किनारे पर पड़ा होकर समुद्र तट को अपनी आभा से आलोकित करता है। साथ ही वह उसे मधुरता एवं नीरवता से परिपूर्ण संसार में सुलझे हुए रहस्य की तरह दिखाई देता है।

(v) पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने सागर की लहरों द्वारा फेंकी हुई मणि से मन की तलना करके उसके एकांकी जीवन की निराशा और कर्म-विरत स्थिति का। चित्रण किया है। जिसे वे श्रद्धा द्वारा यह कहलवाकर प्रकट करते हैं कि । तुम्हारे चंचल मन ने आलस्य को ग्रहण कर लिया है।

  • 2 और देखा वह सुन्दर दृश्य
    नयन का इन्द्रजाल अभिराम।
    कुसुम-वैभव में लता समान
    चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।
    हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
    एक लम्बी काया, उन्मुक्त।
    मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल
    सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।
    मसूण गान्धार देश के, नील
    रोम वाले मेषों के चर्म,
    ढक रहे थे उसका वपु कान्त
    बन रहा था वह कोमल वर्म।
    नील परिधान बीच सुकुमार
    खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,
    खिला हो ज्यों बिजली का फूल
    मेघ-वन बीच गुलाबी रंग।
    आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम-
    बीच जब घिरते हों घन श्याम;
    अरुण रवि मण्डल उनको भेद
    दिखाई देता हो छविधाम!
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) ‘हृदय की अनुकृति बाह्य उदार पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति से कवि का आशय यह है कि श्रद्धा आन्तरिक रूप से जितनी उदार, भावुक, कोमल हृदय की थी, उसका बाह्य रूप भी वैसा ही था। वह अपने आन्तरिक गुण से जिस प्रकार सबको मोहित कर लेती थी, उसी प्रकार उसका रूप सौन्दर्य भी सभी को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम था।

(ii) कवि द्वारा किए गए श्रद्धा के रूप सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर कवि श्रद्धा के रूप सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसके नयन अत्यधिक आकर्षक थे, वह स्वयं लता के समान सुन्दर एवं शीतल थे, घने केशों के मध्य उसका मुख चन्द्रमा के समान प्रतीत होता था, उसके तन की सुगन्ध बसन्ती बयार की तरह हृदय को शीतलता प्रदान कर रही थी। अपने कोमल हृदय के समान उसका बाह्य रूप भी अत्यन्त सुन्दर था।

(iii) कवि ने पद्यांश में घनश्याम शब्द का दो बार प्रयोग किया है उनका अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर कवि ने उपरोक्त पद्यांश में ‘चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम’ तथा ‘बीच जब घिरते हों घन श्याम’ के रूप में दो बार घनश्याम शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु दोनों बार उसके अर्थ भिन्न-भिन्न हैं। पहले घनश्याम का अर्थ बादल तथा दूसरे घनश्याम का अर्थ शाम का समय का बादल है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका के मुख की तुलना किस-किस-से की गई है? |
उत्तर पद्यांश में नायिका के मुख की तुलना दो भिन्न स्थानों पर दो भिन्न उपमानों से। की गई है। पहले स्थान पर ‘चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम’ में नायिका की तुलना। बादलों के बीच दिखने वाले चाँद से की गई है। वहीं दूसरे स्थान पर ‘अरुण राव, मण्डल उनको भेद दिखाई देता हो छविधाम’ में शाम के समय आकाश में छाए
बादलों के बीच दिखाई देने वाले सूर्य से की गई है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अनुप्रास, उपमा, रूपकातिशयोक्ति व उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग किया है। ‘चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम’ में रूपक अलंकार, ‘सुशोभित हो सौरभ संयुक्त’ में अनुप्रास अलंकार,, ‘खिला हो ज्यों बिजली का फल’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

  • 3 घिर रहे थे धुंघराले बाल
    अंश अवलम्बित मुख के पास;
    नील घन-शावक-से सुकुमार
    सुधा भरने को विधु के पास।
    और उस मुख पर वह मुसक्यान
    रक्त किसलय पर ले विश्राम;
    अरुण की एक किरण अम्लान
    अधिक अलसाई हो अभिराम।
    कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच
    बना जीवन रहस्य निरुपाय;
    एक उल्का-सा जलता भ्रान्त
    शून्य में फिरता हूँ असहाय।”
    “कौन हो तुम वसन्त के दूत
    बिरस पतझड़ में अति सुकुमार;
    घन तिमिर में चपला की रेख
    तपन में शीतल मन्द बयार!”
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) कवि ने श्रद्धा के बालों की तुलना किससे की है?
उत्तर कवि श्रद्धा के बालों की तुलना नन्हें बादलों से करते हुए कहता है कि उसके सुन्दर और घुघराले केश जो उसके चेहरे से होकर कन्धों पर ऐसे झूल रहे थे मानो अमृत पान करने हेतु नन्हें बादल सागर तल को स्पर्श करने की कोशिश कर रहे हों।

(ii) श्रद्धा की मुस्कान का वर्णन करते हुए कवि क्या कहता है? ।
उत्तर श्रद्धा की मुस्कान का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि उसके सुन्दर मुख पर बिखरी हुई मुस्कान को देखकर ऐसा आभास होता है जैसे सूर्य की कोई अलसाई-सी उज्ज्वल किरण लाल नवीन कोपल पर विश्राम कर रही हो। ।

(iii) मनु श्रद्धा से क्या कहता है?
उत्तर मनु श्रद्धा को अपना परिचय देते हुए कहता है कि उसका जीवन पृथ्वी और आकाश के मध्य भटकता हुआ एक रहस्य के समान बन गया है, किन्तु इसके उपरान्त भी वह जीवन जीने के लिए विवश है। उसे इस स्थिति से उभरने का कोई मार्ग नहीं मिल रहा, जिस कारण वह अनेक प्रकार की मुसीबतों को झेलते हुए असहाय एवं अकेला भटक रहा है।

(iv) मनु श्रद्धा की समानता किस-किस के साथ प्रकट करता है?
उत्तर मनु श्रद्धा की समानता पतझड़ के पश्चात् आने वाली बसन्त ऋतु तथा आकाश में छाए काले घने बादलों के बीच चमकने वाली बिजली से प्रकट करता है। मनु के अनुसार श्रद्धा ने उसके नीरस एवं समस्याओं से ग्रस्त जीवन में आकर नई आशाओं का संचार किया है।।

(v) “विधु’, ‘तिमिर’, ‘चपला’ व ‘बयार’ शब्दों के अर्थ बताइए।
उत्तर
शब्द अर्थ शब्द अर्थ
विधु चन्द्रमा तिमिर अन्धेरा
चपला बिजली बयार हवा

  • 4 यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न
    भूत-हित-रत किसका यह दान!
    इधर कोई है अभी सजीव,
    हुआ ऐसा मन में अनुमान।
    तपस्वी! क्यों इतने हो क्लान्त,
    वेदना का यह कैसा वेग?
    आह! तुम कितने अधिक हताश
    बताओ यह कैसा उद्वेग?
    “दु:ख की पिछली रजनी बीत
    विकसता सुख का नवल प्रभात;
    एक परदा यह झीना नील
    छिपाए है जिसमें सुख गात।
    जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
    जगत् की ज्वालाओं का मूल;
    ईश का वह रहस्य वरदान
    कभी मत इसको जाओ भूल।”
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि श्रद्धा एवं मनु के कथनों के माध्यम से जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करते हुए निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। कवि कहना चाहता है कि जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ आएँगी. लेकिन हमें निराश होकर आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।।

(i) श्रद्धा मनु के पास पहुँचने का क्या कारण बताती है?
उत्तर श्रद्धा मनु को बताती है कि विराट हिमालय के इस वीरान क्षेत्र में जब उसे जीव-जन्तुओं के लिए अपने भोजन में से निकालकर अलग रखे गए भोजन के अंश दिखाई दिए, तो उसे उस प्रदेश में किसी व्यक्ति के रहने की अनुभूति हुई और इसी वजह से वह मनु के पास पहुंची।

(iii) ‘दःख की पिछली रजनी बीत, विकसता सुख का नवल प्रभात पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि जिस प्रकार रात्रि के पश्चात् सूर्योदय होता है और सम्पूर्ण जगत् प्रकाशमय हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में व्याप्त दुःखों के पश्चात् सुख का सर्य भी उदित होता है।

(iv) श्रद्धा मनु को किस प्रकार प्रेरित करती है?
उत्तर जीवन से हताश एवं निराश मनु को प्रेरित करते हुए श्रद्धा उसे जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए समझाते हुए कहती है कि जिस दुःख से परेशान होकर तुमने उसे अभिशाप मान लिया है वह एक वरदान है, जो तुम्हें सदा सुख को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता रहता है।

(v) ‘रजनी’ व ‘प्रभात’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर
शब्द पर्यायवाची
रजनी रात, निशा
प्रभात सुबह, सवेरा

  • 5 कहा आगन्तुक ने सस्नेह-
    “अरे, तुम इतने हुए अधीर;
    हार बैठे जीवन का दाँव
    जीतते मर कर जिसको वीर।
    तप नहीं केवल जीवन सत्य
    करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;
    तरल आकांक्षा से है भरा
    सो रहा आशा का आह्लाद।
    प्रकृति के यौवन का श्रृंगार
    करेंगे कभी न बासी फूल;
    मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र
    आह उत्सुक है उनको धूला
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) श्रद्धा मनु को प्रेरित करते हुए क्या कहती है?
उत्तर श्रद्धा मनु की हताश एवं निराशा से युक्त मनःस्थिति को पहचान कर उसे प्रेरित करते हुए कहती है कि जीवन अमल्य है। जीवन में आने वाली कठिनाइयों से हारकर तप एवं साधना के मार्ग को अपना लेना ही जीवन नहीं है, बल्कि जीवन आशा, उत्साह, उमंग का नाम है। अतः क्षणभर के दुःख से मनुष्य को निराश नहीं होना चाहिए।

(ii) श्रद्धा दुःख को किसके समान मानती है और क्यों?
उत्तर श्रद्धा के अनुसार, मानव जीवन में दु:ख का अस्तित्व क्षण भर का है, क्योंकि वास्तव में मनुष्य का जीवन, आशा, उत्साह एवं खुशियों से युक्त है और हमें केवल इन भावों को जागृत करने की आवश्यकता है। अतः हमें निराशा का दामन छोड़कर आशान्वित होकर जीना चाहिए।

(iii) ‘प्रकृति के यौवन का श्रृंगार, करेंगे कभी न बासी फूल’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति से कवि का आशय यह है कि जिस प्रकार बासी अर्थात् मुरझाए हुए फूल प्रकृति की शोभा नहीं बढ़ाते, उस प्रकार निराश, हताश एवं अकर्मण्य व्यक्ति जीवन रूपी ईश्वर प्रदत्त इस अमूल्य निधि का शोभा को व्यर्थ गँवा देते हैं। अतः मनुष्य को इन अवगुणों का त्याग कर देना चाहिए।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश के आधार पर श्रद्धा के मनोभावों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश के आधार पर कहा जा सकता है कि श्रद्धा का जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है। वह जीवन में आने वाली कठिनाइयों एवं परेशानियों को जीवन का अंग मानती हैं और उनका सामना करते हुए उसे उत्साह व उमंग के साथ जीती हैं।

(v) प्रस्तुत पद्यांश के शिल्प पक्ष पर संक्षेप में टिप्पणी कीजिए।
उत्तर पद्यांश की भाषा तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। कवि ने
प्रबन्धात्मक शैली का प्रयोग करते हए कथ्य को एक कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। काव्य रचना के लिए कवि ने शृंगार छन्द का प्रयोग करने के साथ ही लक्षणा शब्द शक्ति व प्रसाद गुण का प्रयोग किया है। काव्यांश में अनुप्रास एवं मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग किया गया है, इसके अतिरिक्त पद की तुकान्तता एवं लयात्मकता उसे गेय रूप प्रदान करती है।

  • 6 समर्पण लो सेवा का सार
    सजल संसृति का यह पतवार;
    आज से यह जीवन उत्सर्ग
    इसी पद तल में विगत विकार।
    बनो संसृति के मूल रहस्य
    तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;
    विश्व भर सौरभ से भर जाए
    सुमन के खेलो सुन्दर खेल।
    और यह क्या तुम सुनते नहीं
    विधाता का मंगल वरदान-
    ‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो’
    विश्व में गूंज रहा, जय गान।
    डरो मत अरे अमृत सन्तान
    अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;
    पूर्ण आकर्षण जीवन केन्द्र
    खिची आवेगी सकल समृद्धि!
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) श्रद्धा मनु के समक्ष अपनी कौन-सी इच्छा व्यक्त करती है?
उत्तर श्रद्धा मनु के समक्ष स्वयं को उसकी जीवन संगिनी के रूप में स्वीकार । कर लेने की इच्छा व्यक्त करती है। वह उससे कहती हैं कि मनु के द्वारा उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेने से वे दोनों इस सृष्टि अर्थात् मानव जाति की सेवा कर सकेंगे। ।

(ii) “बनो संसृति के मूल रहस्य’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से श्रद्धा मन से स्वयं को पत्नी के रूप में स्वीकार कर इस निर्जन संसार में मानव की उत्पत्ति का मूलाधार बनने का आग्रह करती है। उसका आशय यह है कि उन दोनों के मिलन से ही इस जगत् में मनुष्य जाति की उत्पत्ति सम्भव होगी।

(iii) शक्तिशाली हो विजयी बनो पंक्ति के माध्यम से श्रद्धा मन से क्या कहना चाहती है?
उत्तर ‘शक्तिशाली हो विजयी बनो’ पंक्ति के माध्यम से श्रद्धा मनु की एकान्त। में जीवनयापन करने की इच्छा एवं निराश व हताश मनःस्थिति में परिवर्तन करके उसे अकर्मण्यता को त्यागकर कर्तव्यशील बनकर को विजय करने की प्रेरणा देना चाहती है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्रबन्धात्मक शैली का प्रयोग किया है। कवि ने काव्य रचना के लिए तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है, जो भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतःसक्षम है। भाषा सहज, सरल एवं प्रभावमयी है।

(v) ‘विगत’ व ‘आकर्षण’ शब्दों के विलोमार्थी शब्द लिखिए।
उत्तर शब्द विलोमार्थक शब्द विलोमार्थक विगत आगत आकर्षण विकर्षण

  • 7 विधाता की कल्याणी सृष्टि
    सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;
    पटें सागर, बिखरें ग्रह-पुंज |
    और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।
    उन्हें चिनगारी सदृश सदर्प
    कुचलती रहे खड़ी सानन्द;
    आज से मानवता की कीर्ति
    अनिल, भू, जल में रहे न बन्द।
    जलधि के फूटें कितने उत्स
    द्वीप, कच्छप डूबें-उतराय; |
    किन्तु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति
    अभ्युदय का कर रही उपाय।
    शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त
    विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
    समन्वय उसका करे समस्त
    विजयिनी मानवता हो जाय।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) श्रद्धा मनु को स्वयं वरण करने हेतु क्या कहकर प्रेरित करती है?
उत्तर श्रद्धा मनु से कहती हैं कि यदि वह उसका वरण कर लेता है, तो वह संसार के सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं के लिए मानव-सृष्टि कल्याणकारी होगी। मानव समस्त प्राकृतिक आपदाओं; जैसे-ज्वालामुखी विस्फोट, उफनते सागरों आदि पर विजय
पाकर समस्त जीवों की रक्षा करेगा, इसलिए उसे उसका वरण कर लेना चाहिए।

(ii) श्रद्धा जल-प्लावन की घटना का उल्लेख क्यों करती है?
उत्तर श्रद्धा जल-प्लावन की घटना का उल्लेख मनु को यह समझाने के लिए करती है कि इस प्रलयकारी घटना के पश्चात् भी मानवता की रक्षा एवं उत्थान हेतु नव प्रयास जारी रहे। अतः मनु को स्वयं को निरुपाय न मानकर समस्या के समाधान पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

(iii) श्रद्धा विद्युतकणों के माध्यम से क्या कहना चाहती है?
उत्तर श्रद्धा विद्युत कणों के माध्यम से यह कहना चाहती है कि जिस प्रकार ये अलग-अलग होने पर शक्तिहीन होते हैं, किन्तु एकत्रित होते ही शक्ति का स्रोत बन जाते हैं, उसी प्रकार मानव भी जब अपनी शक्ति को पहचानकर एकत्रित कर लेता है तो वह विश्व-विजेता बन जाता है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर अलंकार किसी भी काव्य रचना के सौन्दर्य में वृद्धि करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रस्तुत पद्यांश में भी कवि ने विभिन्न अलंकारों का प्रयोग किया है। ‘सदृश सदर्प’ में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार तथा विद्युतकणी । का उदाहरण देने के कारण दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है। ।

(v) “अभ्युदय’ व ‘निरुपाय में से उपसर्ग व मूल शब्द अलग-अलग कीजिए।
उत्तर
शब्द उपसर्ग मूलशब्द शब्द उपसर्ग मूलशब्द
अभ्युदय अभि उदय निरुपाय निर् उपाय

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